प्रयागराज, 20 जनवरी 2026। प्रयागराज माघ मेला 2025-26 के दौरान ज्योतिष्पीठ (ज्योतिर्मठ) के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। उत्तर प्रदेश सरकार और मेला प्रशासन अब खुलकर उनके खिलाफ सामने आ गए हैं। प्रयागराज मेला प्राधिकरण ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को नोटिस जारी कर 24 घंटे के भीतर स्पष्टीकरण मांगा है, जिसमें उनके द्वारा “शंकराचार्य” उपाधि के प्रयोग पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं।
यह कार्रवाई मौनी अमावस्या (19 जनवरी 2026) के दिन संगम स्नान को लेकर हुए विवाद के बाद की गई है, जिसने धार्मिक, प्रशासनिक और राजनीतिक रूप ले लिया है।
संगम स्नान से पहले शुरू हुआ विवाद
मौनी अमावस्या के पावन अवसर पर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद अपनी पालकी (रथ) में सवार होकर संगम स्नान के लिए जा रहे थे। इसी दौरान मेला प्रशासन ने सुरक्षा व्यवस्था और भारी भीड़ का हवाला देते हुए उनकी पालकी को आगे बढ़ने से रोक दिया।
इससे नाराज स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने इसे अपमानजनक बताते हुए सनातन परंपराओं से छेड़छाड़ का आरोप लगाया। उन्होंने संगम स्नान नहीं किया और मेला क्षेत्र स्थित अपने शिविर के बाहर धरने पर बैठ गए। स्वामी जी ने अनशन और विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया तथा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से सार्वजनिक माफी की मांग की।
नोटिस में क्या कहा गया है?
प्रयागराज मेला प्राधिकरण के उपाध्यक्ष द्वारा जारी नोटिस में सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का हवाला दिया गया है। नोटिस के अनुसार:
- ज्योतिष्पीठ शंकराचार्य पद से जुड़ा मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है (सिविल अपील संख्या 3010/2020 और 3011/2020)।
- सुप्रीम कोर्ट ने 14 अक्टूबर 2022 के आदेश में स्पष्ट किया था कि अंतिम निर्णय तक ज्योतिष्पीठ (बद्रीनाथ) में किसी भी व्यक्ति का पट्टाभिषेक नहीं किया जा सकता।
- आईए संख्या 153943/2022 के तहत पट्टाभिषेक पर रोक लागू है।
- इसके बावजूद माघ मेला 2025-26 में लगे शिविर बोर्ड पर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को ज्योतिष्पीठ का शंकराचार्य दर्शाया गया है।
- यह सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवहेलना मानी जा सकती है।
नोटिस में स्पष्ट किया गया है कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद 24 घंटे के भीतर यह बताएं कि वे किस आधार पर “शंकराचार्य” शब्द का प्रयोग कर रहे हैं।
ज्योतिष्पीठ शंकराचार्य विवाद की पृष्ठभूमि
ज्योतिष्पीठ (ज्योतिर्मठ) के शंकराचार्य पद को लेकर लंबे समय से कानूनी विवाद चल रहा है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का पट्टाभिषेक सितंबर 2022 में हुआ था, लेकिन इसके बाद अक्टूबर 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने किसी भी नए पट्टाभिषेक पर रोक लगा दी।

प्रशासन का कहना है कि अंतिम फैसले तक कोई भी व्यक्ति आधिकारिक रूप से शंकराचार्य नहीं माना जा सकता, इसलिए मेला क्षेत्र में इस उपाधि का प्रचार नियमों के विरुद्ध है।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद पक्ष का जवाब
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के मीडिया प्रभारी शैलेंद्र योगीराज ने कहा कि उनका पट्टाभिषेक सुप्रीम कोर्ट के आदेश से पहले ही हो चुका था, इसलिए रोक का आदेश उन पर लागू नहीं होता। उन्होंने दावा किया कि अन्य पीठों के शंकराचार्यों का भी उन्हें समर्थन प्राप्त है।
राजनीतिक बयानबाजी तेज
इस मामले ने अब राजनीतिक तूल भी पकड़ लिया है।
- कांग्रेस ने इसे सनातन विरोधी कदम बताते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से हस्तक्षेप की मांग की।
- समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से फोन पर बातचीत कर समर्थन जताया और जल्द मिलने की बात कही।
वहीं, प्रशासन ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि पालकी को रोका जाना भीड़ प्रबंधन और सुरक्षा के लिहाज से जरूरी था और इसका उद्देश्य किसी भी तरह का अपमान नहीं था।
प्रशासन का दावा: नियम सबके लिए समान
मेला आयुक्त और पुलिस अधिकारियों ने कहा कि माघ मेला क्षेत्र में सभी संतों और संगठनों के लिए नियम समान हैं। पूर्व में भी बिना अनुमति जुलूस, पालकी या विशेष व्यवस्था पर रोक लगाई जाती रही है।







