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सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाईकोर्ट के आदेश को बरकरार रखा

BPC News National Desk
3 Min Read

सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाईकोर्ट के उस अहम आदेश को बरकरार रखा है, जिसमें तमिलनाडु के मदुरै जिले की तिरुप्परनकुंड्रम पहाड़ी पर स्थित सिकंदर बदुशा औलिया दरगाह में नमाज अदा करने और धार्मिक गतिविधियों को लेकर सख्त सीमाएं तय की गई थीं। शीर्ष अदालत ने दरगाह परिसर में पशु बलि पर लगाए गए प्रतिबंध को भी यथावत रखा है।

केवल रमज़ान और बकरीद पर ही नमाज की अनुमति

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मद्रास हाईकोर्ट के आदेश के अनुसार, दरगाह परिसर में मुसलमानों को केवल रमज़ान और बकरीद के अवसर पर ही नमाज अदा करने की अनुमति होगी। अन्य दिनों में नियमित नमाज की अनुमति नहीं दी जाएगी।

यह व्यवस्था नेलिथोप्पु (Nellithoppu) क्षेत्र तक सीमित रहेगी और इसके साथ कई शर्तें भी लागू होंगी।

पशु बलि पर पूर्ण प्रतिबंध कायम

कोर्ट ने दरगाह परिसर में पशु बलि की प्रथा पर पूर्ण प्रतिबंध को बरकरार रखा। हाईकोर्ट ने पहले ही यह स्पष्ट किया था कि पशु बलि को एक अनिवार्य धार्मिक परंपरा सिद्ध करने के लिए कोई ठोस ऐतिहासिक या दस्तावेजी प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया गया

इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में हस्तक्षेप से इनकार कर दिया।

मद्रास हाईकोर्ट के अक्टूबर 2025 के आदेश की पुष्टि

यह मामला अक्टूबर 2025 में मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै बेंच द्वारा दिए गए फैसले से जुड़ा है, जिसमें न्यायमूर्ति आर. विजयकुमार ने विस्तृत आदेश पारित किया था। हाईकोर्ट ने:

  • पहाड़ी का पारंपरिक नाम “तिरुप्परनकुंड्रम हिल” बरकरार रखा

  • नाम बदलने की मांग खारिज की

  • पशु बलि पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया

सख्त शर्तों के साथ धार्मिक गतिविधियों की अनुमति

हाईकोर्ट के आदेश के अनुसार, जिन शर्तों को सुप्रीम कोर्ट ने भी बरकरार रखा है, उनमें शामिल हैं:

  • गैर-शाकाहारी भोजन ले जाने या परोसने पर प्रतिबंध

  • मंदिर जाने वाले श्रद्धालुओं के मार्ग में किसी प्रकार की बाधा नहीं

  • केवल निर्धारित दिनों और सीमित संख्या में लोगों को अनुमति

संरक्षित स्मारक होने के कारण सख्त नियम

तिरुप्परनकुंड्रम पहाड़ी प्राचीन स्मारक एवं पुरातात्विक स्थल एवं अवशेष अधिनियम, 1958 के अंतर्गत एक संरक्षित स्मारक है। ऐसे स्थलों पर धार्मिक गतिविधियों को लेकर कानूनी रूप से नियमन लागू होता है।

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि संरक्षित स्मारक होने के कारण यहां धार्मिक प्रथाओं पर कानूनी नियंत्रण आवश्यक है।

पहले भी उत्सवों पर लग चुकी हैं सीमाएं

जनवरी 2026 में हाईकोर्ट ने संथनकूडु उरुस जैसे उत्सवों को लेकर भी सख्त निर्देश जारी किए थे, जिनमें:

  • सीमित संख्या में लोगों की भागीदारी

  • पशु बलि पर पूर्ण प्रतिबंध

जैसी शर्तें शामिल थीं।

धार्मिक सद्भाव और कानून व्यवस्था को मिलेगा बल

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला धार्मिक सद्भाव, कानूनी साक्ष्यों पर आधारित धार्मिक प्रथाओं और संरक्षित स्थलों की सुरक्षा को मजबूत करने वाला माना जा रहा है। इससे क्षेत्र में शांति, व्यवस्था और आपसी संतुलन बनाए रखने में मदद मिलने की उम्मीद है।

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