मुहिद्दीनपुर दबारसी डंपिंग ग्राउंड पर विवाद एक बार फिर गरमा गया है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने इस मामले में गंभीर संज्ञान लेते हुए संबंधित विभागों से रिपोर्ट मांगी है।
ग्रामीणों का आरोप है कि श्री जी कोल कंपनी द्वारा संचालित ठोस कचरा प्रबंधन प्लांट पर्यावरणीय नियमों की धज्जियां उड़ा रहा है, लेकिन बार-बार विरोध के बावजूद कोई स्थायी समाधान नहीं निकला।
NGT में सुनवाई, नियमों के उल्लंघन के आरोप
नई दिल्ली/गाजियाबाद। हेल्प एशियन फाउंडेशन की याचिका पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की प्रिंसिपल बेंच में सुनवाई हुई।
याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि मुहिद्दीनपुर दबारसी गांव में स्थित कचरा प्रबंधन प्लांट पर्यावरण संरक्षण नियमों का घोर उल्लंघन कर रहा है। प्लांट के चारों ओर न तो बाउंड्री वॉल बनाई गई है और न ही पक्की सड़क का निर्माण किया गया है।
इसके चलते कच्चे रास्तों पर कचरा ढोने वाले ट्रकों से भारी धूल उड़ रही है, जिससे आसपास का क्षेत्र प्रदूषित हो रहा है।
ग्रीन बेल्ट की कमी से बढ़ा खतरा
याचिका में यह भी कहा गया है कि प्लांट के आसपास हरित पट्टी (ग्रीन बेल्ट) विकसित नहीं की गई है, जो स्थानीय निवासियों और किसानों के स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन गया है।
ग्राम प्रधान की शिकायतों और फोटोग्राफिक साक्ष्यों को ट्रिब्यूनल के समक्ष पेश किया गया, जिसके बाद नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने मामले को गंभीर मानते हुए सभी पक्षकारों को नोटिस जारी कर दिया है।
साथ ही संबंधित विभागों को मौके पर निरीक्षण कर विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए हैं।
ग्रामीणों की पीड़ा और विरोध
स्थानीय ग्रामीण लंबे समय से इस डंपिंग ग्राउंड का विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि प्लांट से निकलने वाली दुर्गंध, धूल और प्रदूषण से उनकी फसलें बर्बाद हो रही हैं और स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ रही हैं।
कई बार प्रदर्शन और शिकायतें की जा चुकी हैं, लेकिन प्रशासनिक स्तर पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
यह प्लांट प्रतिदिन लगभग 900 मीट्रिक टन ठोस कचरे का प्रसंस्करण करता है और यह कृषि भूमि पर स्थित है, जिससे किसानों में गहरा असंतोष है।
अगली सुनवाई 2 जुलाई को
नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने अगली सुनवाई 2 जुलाई 2026 को निर्धारित की है। इस तारीख पर सभी पक्षों की रिपोर्ट आने के बाद ट्रिब्यूनल आगे का फैसला करेगा।
स्थानीय लोगों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं की नजरें अब इस सुनवाई पर टिकी हुई हैं।
बोर्ड और प्रशासन की भूमिका
अब गाजियाबाद नगर निगम और उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को ट्रिब्यूनल के समक्ष अपना पक्ष रखना होगा और सुधारात्मक कदमों की जानकारी देनी होगी।
यह मामला एक बार फिर दिखाता है कि शहरी कचरा प्रबंधन और पर्यावरण संरक्षण के बीच बेहतर समन्वय की कितनी आवश्यकता है। यदि समय रहते समाधान नहीं निकला, तो न केवल ग्रामीणों का जीवन प्रभावित होगा, बल्कि बड़े स्तर पर पर्यावरणीय क्षति भी हो सकती है।








