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गाजियाबाद के हरीश राणा का 13 साल के कोमा के बाद निधन

BPC News National Desk
5 Min Read

भारत में पहली बार पैसिव इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) को सुप्रीम कोर्ट की स्पष्ट अनुमति के बाद लागू किया गया है। यह मामला गाजियाबाद के 31 वर्षीय हरीश राणा से जुड़ा है, जिनका 24 मार्च 2026 को नई दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में निधन हो गया।

करीब 13 वर्षों तक वे वेजिटेटिव स्टेट (Vegetative State) में रहे। उनकी स्थिति में सुधार की कोई संभावना नहीं थी, जिसके बाद परिवार ने अदालत से “सम्मानजनक मृत्यु” (Right to Die with Dignity) की अनुमति मांगी थी।

क्या है पैसिव इच्छामृत्यु?

पैसिव इच्छामृत्यु वह प्रक्रिया है जिसमें मरीज को जीवित रखने वाली चिकित्सा सहायता को हटा दिया जाता है, ताकि उसकी प्राकृतिक मृत्यु हो सके।

इसमें शामिल हैं:

  • फीडिंग ट्यूब हटाना
  • क्लिनिकली असिस्टेड न्यूट्रिशन एंड हाइड्रेशन (CANH) रोकना
  • लाइफ सपोर्ट सिस्टम हटाना

ध्यान देने वाली बात यह है कि सक्रिय इच्छामृत्यु (Active Euthanasia) जैसे इंजेक्शन देकर मृत्यु देना भारत में अभी भी अवैध है।

हरीश राणा केस का पूरा इतिहास

हरीश राणा मूल रूप से गाजियाबाद के निवासी थे। वर्ष 2013 में चंडीगढ़ में पंजाब यूनिवर्सिटी के पास अपने पीजी हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के कारण उन्हें गंभीर मस्तिष्क चोट (Brain Injury) लगी थी।

इस दुर्घटना के बाद वे कोमा जैसी स्थिति में चले गए और उन्हें स्थायी वेजिटेटिव स्टेट घोषित किया गया। पिछले 13 वर्षों में उनकी स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ।

उनके माता-पिता ने लंबे समय तक अदालत में याचिका दायर कर यह मांग की कि उनके बेटे को इस असहनीय स्थिति से मुक्ति दी जाए।

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

11 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस जेबी पारदीवाला और केवी विश्वनाथन की बेंच ने इस मामले में ऐतिहासिक निर्णय सुनाया।

कोर्ट ने कहा कि “Right to Die with Dignity” संविधान के अनुच्छेद 21 का हिस्सा है और मरीज की गरिमा सर्वोपरि है। अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि पूरी प्रक्रिया मेडिकल प्रोटोकॉल और निगरानी के तहत की जाए।

एम्स को निर्देश दिया गया कि प्रक्रिया पेलिएटिव केयर यूनिट में पूरी की जाए और मरीज की गरिमा का पूरा ध्यान रखा जाए।

एम्स में क्या हुआ?

16 मार्च 2026 को एम्स में हरीश राणा की फीडिंग ट्यूब हटा दी गई। इसके बाद उन्हें पेलिएटिव केयर में रखा गया।

लगभग एक सप्ताह बाद, 24 मार्च 2026 को उन्होंने अंतिम सांस ली।

परिवार ने इस फैसले को स्वीकार करते हुए कहा कि वे लंबे समय से अपने बेटे को इस कष्ट से मुक्ति दिलाना चाहते थे।

देश में क्यों छिड़ी बहस?

इस घटना के बाद पूरे देश में इच्छामृत्यु को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। कुछ लोग इसे मानवीय और संवेदनशील निर्णय मानते हैं, जबकि अन्य इसे नैतिक रूप से चुनौतीपूर्ण बताते हैं।

समर्थन करने वाले लोगों का मानना है कि यह मरीज की गरिमा को प्राथमिकता देता है और असहनीय पीड़ा से मुक्ति देता है। वहीं विरोध करने वाले लोग इसके दुरुपयोग और नैतिक पहलुओं को लेकर चिंता जताते हैं।

भारत में इच्छामृत्यु का कानून

भारत में इच्छामृत्यु पर पहले भी महत्वपूर्ण फैसले दिए जा चुके हैं।

2011 में अरुणा शानबाग मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार पैसिव इच्छामृत्यु को सीमित रूप में अनुमति दी थी। इसके बाद 2018 के Common Cause फैसले में “Living Will” को कानूनी मान्यता दी गई।

हालांकि, इस विषय पर अभी तक कोई व्यापक कानून संसद द्वारा पारित नहीं किया गया है।

इस केस का महत्व

हरीश राणा का मामला इसलिए ऐतिहासिक माना जा रहा है क्योंकि यह पहला मामला है जिसमें सुप्रीम कोर्ट की स्पष्ट अनुमति के बाद पैसिव इच्छामृत्यु लागू की गई।

इस फैसले ने “Right to Die with Dignity” को व्यावहारिक रूप से लागू किया और भविष्य के मामलों के लिए कानूनी दिशा भी स्पष्ट की है।

निष्कर्ष

यह मामला केवल एक कानूनी निर्णय नहीं, बल्कि एक गहरा मानवीय और नैतिक प्रश्न भी है। यह समाज को यह सोचने पर मजबूर करता है कि जीवन, गरिमा और मृत्यु के अधिकार के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।

इस फैसले ने उन परिवारों को उम्मीद दी है जो लंबे समय से अपने प्रियजनों को असहनीय स्थिति में देख रहे हैं।

Disclaimer

यह लेख उपलब्ध रिपोर्ट्स और सार्वजनिक जानकारी पर आधारित है। पैसिव इच्छामृत्यु एक संवेदनशील और कानूनी प्रक्रिया है, जिसमें मेडिकल बोर्ड, परिवार की सहमति और न्यायिक निगरानी आवश्यक होती है।

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