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रुड़की की गंग नहर प्राचीन इंजीनियरिंग का अद्भुत नमूना और इतिहास की अनकही कहानी

BPC News National Desk
3 Min Read

रुड़की | उत्तराखंड का रुड़की शहर केवल एक शैक्षणिक केंद्र ही नहीं, बल्कि भारत की ऐतिहासिक इंजीनियरिंग क्षमता का जीवंत उदाहरण भी है। यहां स्थित गंग नहर को देश की सबसे महत्वपूर्ण सिंचाई परियोजनाओं में गिना जाता है, जिसने उत्तर भारत की कृषि व्यवस्था को नई दिशा दी।

अकाल से जन्मी ऐतिहासिक परियोजना

गंग नहर की परिकल्पना वर्ष 1838 के भीषण अकाल के बाद की गई थी। उस समय सहारनपुर, बिजनौर और मेरठ क्षेत्र भुखमरी की चपेट में थे।

इस संकट को देखते हुए ब्रिटिश इंजीनियर प्रो. वी. काटले ने गंगा से नहर निकालने का प्रस्ताव रखा, जिससे सिंचाई और खाद्यान्न उत्पादन बढ़ाया जा सके।

गंगा से कानपुर तक हरियाली की धारा

हरिद्वार के पास से निकली यह नहर हजारों हेक्टेयर भूमि को सिंचित करते हुए कानपुर तक पहुंचती है।

‘गंगानहर’ के नाम से प्रसिद्ध यह परियोजना आज भी किसानों के लिए जीवनरेखा बनी हुई है।

सोलानी नदी पर बना इंजीनियरिंग का चमत्कार

गंग नहर के निर्माण की सबसे बड़ी चुनौती सोलानी नदी पर पुल बनाना था।

इंजीनियरों ने नदी के ऊपर से नहर को गुजारने के लिए अद्भुत संरचना तैयार की, जिससे नदी और नहर दोनों का प्रवाह बनाए रखा जा सके।

बिना सीमेंट-कंक्रीट के बना मजबूत ढांचा

उस समय आधुनिक निर्माण सामग्री उपलब्ध नहीं थी। ऐसे में भारतीय कारीगरों ने पारंपरिक तकनीकों का इस्तेमाल किया।

चूना, सुर्खी, गुड़, गोबर और जड़ी-बूटियों के मिश्रण से तैयार मसाले से पुल और नहर का निर्माण किया गया।

करीब 170 साल बाद भी यह संरचना मजबूत और कार्यशील है, जो उस समय की इंजीनियरिंग दक्षता को दर्शाती है।

12 साल में पूरी हुई विशाल परियोजना

इस ऐतिहासिक नहर के निर्माण में हजारों मजदूरों और कुशल कारीगरों ने योगदान दिया।

बिजनौर के राजमिस्त्रियों की मेहनत से महज 12 वर्षों में इस परियोजना को पूरा कर लिया गया—जो आज भी एक मिसाल है।

कर्नल काटले का संघर्ष और विवाद

इस परियोजना से जुड़ा एक भावनात्मक पहलू भी है। ब्रिटिश सरकार नहर को जलमार्ग के रूप में विकसित करना चाहती थी, लेकिन प्रो. वी. काटले ने इसे किसानों की सिंचाई के लिए उपयोगी बनाया।

इस फैसले से नाराज ब्रिटिश अधिकारियों ने उन्हें फटकार लगाई, जिससे वे मानसिक रूप से आहत हुए।

आज भी जीवंत है ऐतिहासिक विरासत

आज गंग नहर केवल जल स्रोत नहीं, बल्कि भारत की प्राचीन इंजीनियरिंग, मेहनत और समर्पण का प्रतीक है।

नदी के ऊपर बहती यह नहर आज भी लोगों को आश्चर्यचकित करती है और इतिहास के स्वर्णिम अध्याय की याद दिलाती है।

निष्कर्ष: इंजीनियरिंग और परंपरा का अद्भुत संगम

रुड़की की गंग नहर यह साबित करती है कि सीमित संसाधनों में भी दूरदर्शिता और तकनीकी ज्ञान से असंभव कार्य संभव किए जा सकते हैं।

यह परियोजना आज भी भारत की इंजीनियरिंग विरासत का गौरवशाली उदाहरण बनी हुई है।

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