गाजियाबाद विकास प्राधिकरण एक बार फिर विवादों में है। अवैध निर्माणों के खिलाफ कार्रवाई का दावा करने वाला प्राधिकरण अब खुद अपने ही जवाबों और कार्यप्रणाली में उलझता नजर आ रहा है। शहर में लगातार ऐसे मामले सामने आ रहे हैं जहां पहले किसी भवन को अवैध बताकर सील कर दिया जाता है, लेकिन कुछ ही दिनों बाद उसी भवन में निर्माण कार्य दोबारा शुरू हो जाता है। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि शिकायत होने पर प्राधिकरण की ओर से जवाब दिया जाता है कि भवन का नक्शा पास है और निर्माण वैध है। ऐसे में बड़ा सवाल यह उठता है कि यदि नक्शा पहले से स्वीकृत था तो भवन को सील क्यों किया गया और अगर निर्माण अवैध था तो सीलिंग के दौरान काम कैसे चलता रहा।

गाजियाबाद में अवैध निर्माण और भ्रष्टाचार का मुद्दा कोई नया नहीं है। लंबे समय से शहर में नियमों को ताक पर रखकर बहुमंजिला इमारतें खड़ी होने के आरोप लगते रहे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि बिना अधिकारियों और कर्मचारियों की मिलीभगत के इतने बड़े स्तर पर निर्माण संभव ही नहीं है। आरोप है कि प्राधिकरण के कुछ बाबू और क्षेत्रीय कर्मचारी अवैध निर्माणकर्ताओं से सांठगांठ कर पहले कार्रवाई का दिखावा करते हैं और बाद में फाइलों में खेल करके निर्माण को वैधता देने का रास्ता निकाल लेते हैं।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जिन इमारतों पर सीलिंग की कार्रवाई होती है, वहां भी रात के अंधेरे में या छुट्टी वाले दिनों में निर्माण कार्य जारी रहता है। कई मामलों में स्थानीय लोगों ने इसकी शिकायत प्राधिकरण अधिकारियों से की, लेकिन कार्रवाई के बजाय गोलमोल जवाब देकर मामला शांत करने की कोशिश की गई। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि जब वे निर्माण की वैधता पर सवाल उठाते हैं तो कभी कहा जाता है कि नक्शा पास हो चुका है, तो कभी कहा जाता है कि मामला विचाराधीन है।

यह पूरा मामला अब जीडीए की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। आमतौर पर किसी भी भवन का नक्शा निर्माण शुरू होने से पहले स्वीकृत कराया जाता है। नक्शा पास होने के बाद ही निर्माण की अनुमति दी जाती है। लेकिन गाजियाबाद में कई ऐसे उदाहरण सामने आ रहे हैं जहां पहले निर्माण को अवैध बताकर कार्रवाई होती है और बाद में उसी निर्माण को वैध घोषित कर दिया जाता है। इससे यह संदेह और गहरा हो जाता है कि कहीं नियमों की आड़ में भ्रष्टाचार का खेल तो नहीं चल रहा।
शहर के जानकारों का कहना है कि अवैध निर्माणों पर कार्रवाई सिर्फ कागजों तक सीमित रह गई है। वास्तविकता यह है कि कार्रवाई के नाम पर केवल खानापूर्ति की जाती है। सीलिंग के फोटो खिंचवाकर और प्रेस नोट जारी कर दिए जाते हैं, लेकिन कुछ समय बाद वही भवन दोबारा निर्माणाधीन नजर आता है। इससे साफ प्रतीत होता है कि अंदरखाने कोई बड़ा खेल चल रहा है।
स्थानीय निवासियों का आरोप है कि शिकायत करने वालों को भी कई बार परेशान किया जाता है। कुछ लोग बताते हैं कि जब वे अवैध निर्माण की जानकारी अधिकारियों को देते हैं तो पहले तो आश्वासन मिलता है, लेकिन बाद में कोई ठोस कदम नहीं उठाया जाता। कई बार शिकायतकर्ता को ही कानूनी प्रक्रिया और कागजी कार्रवाई में उलझा दिया जाता है ताकि मामला धीरे-धीरे ठंडे बस्ते में चला जाए।
गाजियाबाद विकास प्राधिकरण की इस कार्यशैली से आम लोगों का भरोसा भी कमजोर हो रहा है। शहर में तेजी से बढ़ते अवैध निर्माण न केवल नियमों की अनदेखी हैं बल्कि सुरक्षा के लिहाज से भी बड़ा खतरा बन सकते हैं। बिना मानकों के बने भवनों में भविष्य में हादसों की आशंका बनी रहती है। इसके बावजूद यदि प्राधिकरण के अधिकारी ही सवालों के घेरे में हों तो स्थिति और गंभीर हो जाती है।

अब जरूरत इस बात की है कि ऐसे मामलों की निष्पक्ष जांच हो और यह स्पष्ट किया जाए कि किन परिस्थितियों में पहले सीलिंग की कार्रवाई की गई और बाद में निर्माण को वैध बताया गया। यदि किसी भवन का नक्शा पहले से पास था तो कार्रवाई करने वाले अधिकारियों की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। वहीं यदि निर्माण अवैध था तो उसे संरक्षण देने वालों पर भी सख्त कार्रवाई जरूरी है।
गाजियाबाद में भ्रष्टाचार और अवैध निर्माण का यह मुद्दा केवल एक विभाग तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह पूरे प्रशासनिक तंत्र की पारदर्शिता और जवाबदेही पर सवाल खड़े कर रहा है। जनता अब यह जानना चाहती है कि आखिर नियम सबके लिए समान हैं या फिर प्रभाव और पैसे के दम पर कानून को बदला जा सकता है।







