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विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन : समय की सबसे बड़ी आवश्यकता

BPC News National Desk
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भारत आज दुनिया के सबसे तेज़ी से विकसित हो रहे देशों में शामिल है। आधुनिक एक्सप्रेस-वे, मेट्रो रेल, एयरपोर्ट, रेलवे कॉरिडोर, स्मार्ट सिटी और विशाल आवासीय परियोजनाएँ देश की आर्थिक प्रगति का प्रतीक बन चुकी हैं। अमेरिका, चीन, जापान और सिंगापुर जैसे देशों ने आधारभूत संरचना को मजबूत बनाकर अपनी अर्थव्यवस्था को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया है और भारत भी उसी दिशा में लगातार आगे बढ़ रहा है।

लेकिन विकास की इस तेज़ रफ्तार के साथ पर्यावरण संरक्षण की चुनौती भी गंभीर होती जा रही है। बढ़ती गर्मी, लू, प्रदूषण, जल संकट और जलवायु परिवर्तन आज पूरी दुनिया के लिए चिंता का विषय हैं। यदि समय रहते विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन नहीं बनाया गया, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए स्वच्छ हवा और सुरक्षित जल उपलब्ध कराना कठिन हो जाएगा।

आधारभूत संरचना निर्माण के दौरान पेड़ों की कटाई कई बार अनिवार्य हो जाती है। इसके बदले सरकारें बड़े स्तर पर पौधारोपण अभियान चलाती हैं, लेकिन वास्तविक समस्या पौधे लगाने की नहीं, बल्कि उन्हें जीवित रखने की है। आज अधिकांश वृक्षारोपण केवल सरकारी रिकॉर्ड और फोटो तक सीमित रह जाता है। पौधों की सुरक्षा, सिंचाई और निगरानी के अभाव में वे कुछ ही महीनों में सूख जाते हैं। इसलिए केवल पौधारोपण नहीं, बल्कि कम से कम पाँच वर्षों तक उनकी नियमित देखरेख और समीक्षा अनिवार्य की जानी चाहिए।

दुनिया के कई देशों ने पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किए हैं। सिंगापुर को “गार्डन सिटी” कहा जाता है क्योंकि वहाँ हर बड़े निर्माण के साथ हरित क्षेत्र विकसित करना अनिवार्य है। जापान छोटे-छोटे घने वनों के मॉडल पर कार्य कर रहा है, जबकि चीन ने विशाल हरित पट्टी परियोजनाओं के माध्यम से रेगिस्तानी क्षेत्रों को हरा-भरा बनाने का प्रयास किया है। यूरोप के कई देशों में स्थानीय प्रजातियों के पेड़ लगाए जाते हैं ताकि वे कम पानी में भी लंबे समय तक जीवित रह सकें।

भारत में भी सार्वजनिक-निजी सहभागिता मॉडल को प्रभावी ढंग से लागू किया जा सकता है। सरकार को निजी कंपनियों, स्कूलों, कॉलेजों, उद्योगों और सामाजिक संस्थाओं को “हरित भारत अभियान” से जोड़ना चाहिए। कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व के अंतर्गत कंपनियों को “एक हरित क्षेत्र अपनाएँ” जैसी योजनाओं में भागीदारी के लिए प्रेरित किया जा सकता है।

देश की नई रियल एस्टेट परियोजनाओं, टाउनशिप और औद्योगिक क्षेत्रों में बाउंड्री वॉल के चारों ओर कम से कम 20 फीट चौड़ी हरित पट्टी अनिवार्य की जानी चाहिए। यहाँ केवल छोटे पौधे नहीं, बल्कि नीम, पीपल, अर्जुन, कदंब, अशोक और गुलमोहर जैसे बड़े छायादार वृक्ष लगाए जाने चाहिए। इससे तापमान नियंत्रण, प्रदूषण में कमी और ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ाने में मदद मिलेगी।

इसके साथ ही नई सड़कों, एक्सप्रेस-वे और फ्लाईओवर के किनारों पर बड़े स्तर पर वृक्षारोपण अभियान चलाया जाना चाहिए ताकि भविष्य में ये मार्ग “हरित गलियारे” के रूप में विकसित हो सकें। शहरों में मौजूद बड़े नालों और जल निकासी क्षेत्रों के आसपास भी वृक्षारोपण किया जा सकता है, क्योंकि वहाँ नमी होने से पौधों के जीवित रहने की संभावना अधिक होती है।

सरकार को एक राष्ट्रीय डिजिटल मंच विकसित करना चाहिए, जहाँ लगाए गए पौधों की जियो-टैगिंग, फोटो, निरीक्षण रिपोर्ट और उनकी वर्तमान स्थिति सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हो। इससे पारदर्शिता और जवाबदेही दोनों सुनिश्चित होंगी।

आज आवश्यकता केवल औपचारिक अभियानों की नहीं, बल्कि जनभागीदारी की है। जिस प्रकार “हर घर शौचालय” अभियान ने देश में जागरूकता पैदा की, उसी तरह “हरित भारत अभियान” को भी मिशन मोड में चलाने की आवश्यकता है। यदि प्रत्येक नागरिक अपने जीवन में कम से कम एक पेड़ को परिवार के सदस्य की तरह अपनाकर उसकी देखभाल करे, तो आने वाले वर्षों में भारत का पर्यावरणीय स्वरूप पूरी तरह बदल सकता है।

“पेड़ हैं धरती की शान,
इनसे सुरक्षित हर इंसान।
हरियाली से जीवन मुस्काए,
पेड़ लगाओ, भविष्य बचाओ।”

हमें ऐसा भारत बनाना है जहाँ विकास भी हो और हरियाली भी। यदि सरकार, निजी क्षेत्र और आम नागरिक मिलकर ईमानदारी से प्रयास करें, तो भारत केवल आर्थिक महाशक्ति ही नहीं बल्कि “हरित महाशक्ति” भी बन सकता है।

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