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हरीश राणा को ‘नई जिंदगी’ देने पहुंचे राजस्थान के अखंडानंद बाबा

BPC News National Desk
6 Min Read

सुप्रीम कोर्ट द्वारा इच्छामृत्यु की अनुमति दिए जाने के कुछ ही घंटों बाद गाजियाबाद में एक नया और भावनात्मक मोड़ सामने आया है। 31 वर्षीय हरीश राणा, जो 2013 से कोमा में हैं और पिछले 13 वर्षों से लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर हैं, उनके मामले में अब पारंपरिक उपचार का दावा सामने आया है।

राजस्थान के भीलवाड़ा से आए 62 वर्षीय अखंडानंद बाबा ने दावा किया है कि उनकी देसी जड़ी-बूटियों से बनी दवाइयां हरीश राणा को नई जिंदगी दे सकती हैं। इस दावे के बाद परिवार और आसपास के लोगों में एक बार फिर उम्मीद और बहस दोनों शुरू हो गई है।

बाबा अखंडानंद का दावा: जड़ी-बूटियों से संभव है चमत्कार

अखंडानंद बाबा गाजियाबाद स्थित राज एंपायर सोसाइटी पहुंचे, जहां हरीश राणा का परिवार रहता है। उन्होंने परिवार से संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन सोसाइटी के सुरक्षा गार्ड ने उन्हें अंदर जाने की अनुमति नहीं दी।

इसके बाद बाबा ने पास की एक दुकान के माध्यम से परिवार तक अपना संदेश भिजवाया। लगभग छह घंटे इंतजार करने के बाद हरीश के पिता अशोक राणा नीचे आए और बाबा से करीब 30 मिनट तक बातचीत की।

बाबा का कहना है कि उनके पास ऐसी जड़ी-बूटियों से तैयार की गई दवाइयां हैं, जिन्हें फीडिंग ट्यूब के जरिए मरीज को दिया जा सकता है

एम्स में जांच कराने की भी दी सलाह

बाबा अखंडानंद ने दावा करते हुए कहा:

“मेरे पास घरेलू जड़ी-बूटियों से बना पाउडर और दवाइयां हैं। अगर परिवार चाहे तो इनकी जांच एम्स के डॉक्टरों से कराई जा सकती है। अगर कोशिश की जाए तो चमत्कार भी हो सकता है।”

उन्होंने यह भी कहा कि ये दवाइयां पारंपरिक आयुर्वेदिक पद्धति से तैयार की गई हैं और पहले भी कई गंभीर मरीजों पर असर कर चुकी हैं।

हालांकि, परिवार ने फिलहाल इस प्रस्ताव पर कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया है।

पिता ने कहा: 13 साल की पीड़ा को शब्दों में नहीं बता सकते

हरीश राणा के पिता अशोक राणा ने बाबा की बात ध्यान से सुनी। उन्होंने कहा कि पिछले 13 वर्षों में उनका परिवार बेहद कठिन दौर से गुजरा है।

भावुक होते हुए उन्होंने कहा कि:

“13 साल की पीड़ा को शब्दों में बयान करना मुश्किल है। हमने हर संभव इलाज कराया, लेकिन कोई सुधार नहीं हुआ।”

उन्होंने यह भी कहा कि आगे का निर्णय सुप्रीम कोर्ट के आदेश और डॉक्टरों की सलाह के आधार पर ही लिया जाएगा।

2013 की दुर्घटना के बाद कोमा में चले गए थे हरीश

हरीश राणा की जिंदगी 2013 में एक हादसे के बाद पूरी तरह बदल गई थी।
चंडीगढ़ में चौथी मंजिल से गिरने के कारण उन्हें गंभीर सिर की चोट लगी थी।

इस हादसे के बाद वे स्थायी वेजिटेटिव स्टेट (Permanent Vegetative State) में चले गए और तब से लगातार लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर हैं।

उनके माता-पिता ने वर्षों तक इलाज कराया और इसके लिए घर और जमीन तक बेच दी, लेकिन उनकी स्थिति में कोई सुधार नहीं हो सका।

सुप्रीम कोर्ट ने दी पैसिव इच्छामृत्यु की अनुमति

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच ने इस मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया।

जस्टिस जेबी परदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच ने हरीश राणा के माता-पिता की अपील पर पैसिव इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी।

इस अनुमति के तहत:

  • लाइफ सपोर्ट सिस्टम हटाया जा सकता है

  • क्लिनिकली असिस्टेड न्यूट्रिशन रोका जा सकता है

यह फैसला भारत में 2018 के कॉमन कॉज जजमेंट के बाद ऐसा पहला मामला माना जा रहा है जिसमें अदालत ने स्पष्ट रूप से इस प्रकार की अनुमति दी है।

एम्स में पैलिएटिव केयर वार्ड में शिफ्ट किया जा रहा है

मेडिकल प्रक्रिया पूरी करने के लिए हरीश राणा को अब एम्स (AIIMS) के पैलिएटिव केयर वार्ड में शिफ्ट किया जा रहा है। वहां विशेषज्ञ डॉक्टरों की निगरानी में आगे की प्रक्रिया पूरी की जाएगी।

आस्था बनाम विज्ञान: नई बहस शुरू

अखंडानंद बाबा का अचानक सामने आना इस मामले को एक नया और संवेदनशील मोड़ दे गया है।

कुछ लोग इसे आस्था और उम्मीद की आखिरी किरण मान रहे हैं, जबकि कुछ विशेषज्ञ इसे एक ऐसे परिवार की भावनाओं का फायदा उठाने की कोशिश बता रहे हैं जो पहले से ही बेहद कठिन परिस्थिति में है।

समाज के लिए एक बड़ा सवाल

यह घटना एक बार फिर यह सवाल उठाती है कि चिकित्सा विज्ञान, आस्था और कानूनी फैसलों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।

हरीश राणा का मामला सिर्फ एक परिवार की कहानी नहीं है, बल्कि यह उन हजारों परिवारों के लिए भी एक मिसाल बन सकता है जो लंबे समय से गंभीर रूप से बीमार परिजनों की देखभाल कर रहे हैं।

फिलहाल पूरे देश की नजर इस मामले पर बनी हुई है।

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