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‘लाहौर रेलवे लाइन’ पर कब्जे का आरोप? इतिहास से जुड़ी जमीन पर बढ़ा विवाद

BPC News National Desk
4 Min Read

उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में एक बार फिर इतिहास और वर्तमान आमने-सामने खड़े नजर आ रहे हैं। शहर की पुरानी और ऐतिहासिक ‘लाहौर रेलवे लाइन’ को लेकर विवाद गहराता जा रहा है।

आरोप है कि नगर निगम ने इस बंद पड़ी रेलवे लाइन की जमीन पर निर्माण कार्य कर दिया है, जिसके बाद रेलवे प्रशासन ने इस मामले में रिपोर्ट तलब की है।

150 साल पुराना इतिहास, जो अब विवाद में

इतिहासकारों और रेलवे से जुड़ी पुस्तकों के अनुसार, गाजियाबाद में पहली बार साल 1864 में रेल लाइन बिछाई गई थी। इसके बाद 1870 से 1879 के बीच इस लाइन का विस्तार किया गया।

यह लाइन दिल्ली से शुरू होकर गाजियाबाद, सहारनपुर, जगाधरी होते हुए लाहौर और मुल्तान तक जाती थी। लगभग 483 किलोमीटर लंबी यह लाइन उस समय व्यापार और आवागमन की रीढ़ मानी जाती थी।

गाजियाबाद से लाहौर जाने वाली यह लाइन कैला भट्टा इलाके और मरकज मस्जिद के पास से होकर गुजरती थी। समय के साथ इसका एक बड़ा हिस्सा गुलधर तक बंद कर दिया गया, जबकि आगे की कुछ लाइनें आज भी उपयोग में हैं।

जमीन के नीचे दबी पटरी, ऊपर निर्माण का आरोप

स्थानीय सूत्रों के अनुसार, बंद हो चुकी इस रेलवे लाइन की पटरियां आज भी जमीन के नीचे मौजूद हैं।

इसी जमीन पर अब निर्माण कार्य किए जाने का आरोप नगर निगम पर लगाया जा रहा है। कहा जा रहा है कि जिस जमीन को रेलवे की संपत्ति माना जाता है, उस पर बिना स्पष्ट अनुमति के निर्माण किया गया।

मामला सामने आते ही रेलवे ने इसे गंभीरता से लिया और जांच प्रक्रिया शुरू कर दी है।

रेलवे ने मांगी रिपोर्ट, प्रशासन पर बढ़ा दबाव

रेलवे विभाग ने इस मामले में गाजियाबाद की सदर तहसील के एसडीएम को पत्र लिखकर भूमि की सत्यापन रिपोर्ट मांगी है।

रेलवे का कहना है कि यह स्पष्ट किया जाए कि संबंधित जमीन वास्तव में रेलवे की संपत्ति है या नहीं।

अधिकारियों ने यह भी संकेत दिया है कि यदि समय पर जवाब नहीं मिला, तो दोबारा पत्र भेजकर आगे की कार्रवाई की जाएगी। इससे मामला प्रशासनिक स्तर पर और गंभीर हो गया है।

बंटवारे का गवाह रहा यह ट्रैक

गाजियाबाद रेलवे स्टेशन, जो ब्रिटिश शासन के दौरान बनाया गया था, अपने आप में ऐतिहासिक महत्व रखता है।

भारत के विभाजन 1947 के दौरान पाकिस्तान से आने वाले हिंदू शरणार्थियों को लेकर ट्रेनें भी इसी ट्रैक से होकर गाजियाबाद पहुंची थीं।

इस लिहाज से यह रेलवे लाइन केवल परिवहन का साधन नहीं, बल्कि इतिहास की एक महत्वपूर्ण कड़ी भी रही है।

विकास बनाम विरासत का टकराव

यह मामला अब केवल जमीन के कब्जे तक सीमित नहीं है, बल्कि विकास और विरासत के बीच संतुलन का सवाल भी बन गया है।

एक ओर शहर का तेजी से हो रहा विस्तार और निर्माण कार्य हैं, वहीं दूसरी ओर ऐतिहासिक धरोहरों को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी भी है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह जमीन वास्तव में रेलवे की है, तो निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। साथ ही इस ऐतिहासिक रेलवे लाइन को संरक्षित करने के प्रयास भी जरूरी हैं।

क्या होगा आगे?

अब सभी की नजर प्रशासनिक जांच और रेलवे की अगली कार्रवाई पर टिकी है। यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह मामला बड़े विवाद का रूप ले सकता है।

फिलहाल यह घटना एक बड़ा सवाल खड़ा करती है—
क्या विकास की दौड़ में हम अपनी ऐतिहासिक विरासत को खोते जा रहे हैं?

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