आर्कटिक क्षेत्र में रणनीतिक रूप से अहम ग्रीनलैंड को लेकर वैश्विक ताकतों के बीच तनाव तेज हो गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हालिया बयान के बाद चीन ने कड़ा पलटवार करते हुए अमेरिका को चेतावनी दी है कि वह अपने स्वार्थों के लिए “अन्य देशों को बहाना बनाना बंद करे।”
यह विवाद अब केवल बयानबाजी तक सीमित नहीं रह गया, बल्कि आर्कटिक संसाधनों, सुरक्षा और वैश्विक प्रभाव को लेकर बड़ी शक्तियों के टकराव का संकेत दे रहा है।
ट्रंप का विवादास्पद दावा: ‘ग्रीनलैंड अमेरिका के लिए जरूरी’
जनवरी 2026 में राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि ग्रीनलैंड पर अमेरिका का नियंत्रण जरूरी है, ताकि रूस या चीन वहां अपना प्रभाव न बढ़ा सकें। उन्होंने इसे राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा बताते हुए कहा कि यदि अमेरिका आगे नहीं बढ़ा, तो “शत्रु शक्तियां आर्कटिक में पैर जमा लेंगी।”
यह पहली बार नहीं है।
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2019 में भी ट्रंप ने ग्रीनलैंड ‘खरीदने’ की इच्छा जताई थी,
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जिसे डेनमार्क ने सिरे से खारिज कर दिया था।
अब एक बार फिर 2026 में इस बयान ने कूटनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है।
ग्रीनलैंड क्यों है इतना महत्वपूर्ण?
ग्रीनलैंड:
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डेनमार्क का स्वायत्त क्षेत्र है,
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विशाल बर्फीले इलाके,
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और दुर्लभ खनिजों (Rare Earth Elements) से भरपूर है।
ये खनिज:
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इलेक्ट्रॉनिक्स,
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रिन्यूएबल एनर्जी,
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और सैन्य उपकरणों के लिए बेहद अहम हैं।
इसके अलावा, आर्कटिक क्षेत्र में:
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नए समुद्री व्यापार मार्ग खुल रहे हैं,
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और सैन्य रणनीतिक महत्व लगातार बढ़ रहा है।
चीन का तीखा पलटवार: ‘अमेरिकी विस्तारवाद का बहाना’
चीन के विदेश मंत्रालय ने ट्रंप के बयान पर सख्त प्रतिक्रिया देते हुए कहा:
“अमेरिका ‘चीन खतरा’ का बहाना बनाकर आर्कटिक में अपनी सैन्य विस्तारवादी महत्वाकांक्षाओं को छिपा रहा है।”
बीजिंग ने साफ किया कि:
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आर्कटिक गतिविधियां अंतरराष्ट्रीय कानूनों के अनुरूप होनी चाहिए,
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और कोई भी देश ‘स्वार्थी लाभ’ के लिए दूसरे देशों का इस्तेमाल न करे।
चीन ने अपनी नीति का बचाव करते हुए कहा कि:
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उसके प्रयास वैज्ञानिक अनुसंधान,
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पर्यावरण संरक्षण,
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और सतत विकास पर केंद्रित हैं,
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न कि सैन्य वर्चस्व पर।
रेयर अर्थ और बेल्ट एंड रोड: अमेरिका की चिंता
विशेषज्ञों के अनुसार:
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ग्रीनलैंड में रेयर अर्थ एलिमेंट्स के विशाल भंडार हैं,
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और चीन पहले से ही इन क्षेत्रों में खनन परियोजनाओं में रुचि दिखा चुका है।
चीन, जो दुनिया में रेयर अर्थ का सबसे बड़ा उत्पादक है,
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बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के तहत
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आर्कटिक क्षेत्रों में निवेश बढ़ा रहा है।
यही वजह है कि अमेरिका और उसके सहयोगी चीन की गतिविधियों को रणनीतिक खतरे के रूप में देख रहे हैं।
डेनमार्क और ग्रीनलैंड की स्थिति
यह विवाद डेनमार्क को असहज स्थिति में डाल रहा है।
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ग्रीनलैंड की स्थानीय सरकार ने ‘कब्जा’ वाले बयान को अस्वीकार्य बताया है।
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डेनमार्क ने भी अपनी संप्रभुता पर जोर दिया है।
हालांकि:
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डेनमार्क अमेरिका का NATO सहयोगी है,
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और ग्रीनलैंड में अमेरिकी सैन्य अड्डा (थुले एयर बेस) पहले से मौजूद है।
रूस की सक्रियता और ‘नई कोल्ड वॉर’ का खतरा
इस बीच:
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रूस भी आर्कटिक में अपनी सैन्य क्षमता बढ़ा रहा है,
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जिससे यह क्षेत्र ‘नई कोल्ड वॉर’ का केंद्र बन सकता है।
आर्कटिक काउंसिल के सदस्य देशों के बीच:
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संसाधन साझेदारी,
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पर्यावरण संरक्षण,
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और व्यापार मार्गों पर
बातचीत प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है।
जलवायु परिवर्तन और नए समुद्री रास्ते
जलवायु परिवर्तन के कारण:
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आर्कटिक की बर्फ तेजी से पिघल रही है,
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नॉर्दर्न सी रूट जैसे नए व्यापार मार्ग खुल रहे हैं,
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जो वैश्विक अर्थव्यवस्था की दिशा बदल सकते हैं।
यही कारण है कि:
ग्रीनलैंड अब केवल द्वीप नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन का केंद्र बन चुका है।
विशेषज्ञों की राय: टकराव बढ़ा तो असर वैश्विक होगा
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि:
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यह विवाद केवल ग्रीनलैंड तक सीमित नहीं रहेगा,
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बल्कि आर्कटिक क्षेत्र में सैन्य, आर्थिक और कूटनीतिक टकराव को जन्म दे सकता है।
यदि समय रहते:
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संवाद नहीं बढ़ाया गया,
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और कूटनीतिक समाधान नहीं निकाला गया,
तो यह तनाव वैश्विक स्थिरता के लिए खतरा बन सकता है।
निष्कर्ष: शांति या टकराव – फैसला दुनिया के हाथ में
ग्रीनलैंड पर बढ़ती खींचतान यह साफ संकेत देती है कि:
आर्कटिक अब दुनिया की अगली रणनीतिक जंग का मैदान बन सकता है।
जहां:
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अमेरिका इसे राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा बता रहा है,
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वहीं चीन इसे अमेरिकी विस्तारवाद का बहाना कह रहा है।
अब जरूरत है:
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संयम,
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संवाद,
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और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की,
ताकि आर्कटिक क्षेत्र संघर्ष नहीं, सहयोग का प्रतीक बने।










