उत्तर प्रदेश के संभल हिंसा मामले ने एक नया राजनीतिक और कानूनी मोड़ ले लिया है। 2024 में हुई हिंसा के दौरान पुलिस फायरिंग में एक युवक की मौत के आरोपों के बीच मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीजेएम) की अदालत ने बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने तत्कालीन संभल सर्किल ऑफिसर (सीओ) और वर्तमान एएसपी अनुज चौधरी, इंस्पेक्टर अनुज तोमर समेत 20 पुलिसकर्मियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया है।
यह आदेश संभल के खग्गू सराय अंजुमन निवासी यामीन की याचिका पर सीजेएम विभांशु सुधीर की अदालत ने पारित किया। याचिका में आरोप लगाया गया था कि 24 नवंबर 2024 को शाही जामा मस्जिद क्षेत्र में कोर्ट के आदेश पर चल रहे सर्वे के दौरान भड़की हिंसा में पुलिस ने बेरहमी से गोली चलाई, जिसमें यामीन का 24 वर्षीय बेटा आलम गंभीर रूप से घायल हुआ और बाद में उसकी मौत हो गई।
याचिकाकर्ता ने तत्कालीन सीओ अनुज चौधरी, कोतवाली प्रभारी अनुज तोमर और 15–20 अन्य पुलिसकर्मियों को नामजद किया था।
अखिलेश यादव का तीखा हमला
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कोर्ट के इस आदेश के बाद योगी आदित्यनाथ सरकार और बीजेपी पर जमकर निशाना साधा। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट कर लिखा:
“अब कोई बचाने नहीं आएगा… अब ये पक्षपाती पुलिसकर्मी अकेले में खाली बैठकर याद करेंगे।
भाजपा का फ़ार्मूला न. 1: पहले इस्तेमाल करो फिर बर्बाद करो!
भाजपा का फ़ार्मूला न. 2: भाजपाई किसी के सगे नहीं हैं।”
एक अन्य पोस्ट में अखिलेश यादव ने पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों पर सवाल उठाते हुए कहा कि पुलिस अब कोर्ट के आदेश को अवैध बता रही है, जो कोर्ट की अवमानना हो सकती है। उन्होंने चेतावनी दी कि सत्ता की चापलूसी में ज्यादा “दरोगाई” दिखाना महंगा पड़ सकता है।
संभल हिंसा की पृष्ठभूमि
संभल में हिंसा 24 नवंबर 2024 को तब भड़की थी, जब शाही जामा मस्जिद परिसर में कोर्ट के आदेश पर सर्वे किया जा रहा था। हिंदू पक्ष का दावा था कि यह ढांचा पहले मंदिर था। सर्वे के दौरान माहौल बिगड़ गया और झड़प हो गई।
इस हिंसा में:
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चार लोगों की मौत हुई
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29 पुलिसकर्मी घायल हुए
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पुलिस ने 12 एफआईआर दर्ज कीं
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और सैकड़ों लोगों को गिरफ्तार किया, जिनमें कुछ राजनीतिक नाम भी शामिल थे
तत्कालीन समय में अखिलेश यादव ने इस हिंसा को राजनीतिक साजिश बताया था और निष्पक्ष जांच की मांग की थी। अब कोर्ट के इस आदेश से मामला पलट गया है और पुलिस पर ही कार्रवाई का रास्ता खुल गया है।
पुलिस और सरकार की प्रतिक्रिया
संभल के एसपी कृष्ण कुमार बिश्नोई ने कोर्ट के आदेश को अवैध बताते हुए कहा कि पुलिस इसे हाई कोर्ट में चुनौती देगी। उन्होंने दावा किया कि संभल हिंसा की पहले ही न्यायिक जांच हो चुकी है, इसलिए अलग से एफआईआर की जरूरत नहीं है।
पुलिस विभाग ने साफ किया है कि वह इस आदेश के खिलाफ अपील दायर करने की तैयारी में है।
राजनीतिक निहितार्थ: 2027 की सियासत में एंट्री
इस घटनाक्रम ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में नया विवाद खड़ा कर दिया है।
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समाजवादी पार्टी इसे बीजेपी सरकार की “पक्षपाती पुलिस व्यवस्था” का सबूत बता रही है।
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वहीं बीजेपी इसे कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा बताकर बचाव कर सकती है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अखिलेश यादव इस मुद्दे को 2027 विधानसभा चुनाव तक जोर-शोर से उठाएंगे। यह मामला योगी सरकार के लिए असहज स्थिति पैदा कर सकता है।
आगे क्या?
अब सबकी नजर:
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हाई कोर्ट में पुलिस की अपील,
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एफआईआर दर्ज होने की प्रक्रिया,
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और आगे की न्यायिक सुनवाई
पर टिकी है।
फिलहाल, कोर्ट के इस आदेश ने संभल हिंसा मामले को फिर से सुर्खियों में ला दिया है और उत्तर प्रदेश की राजनीति को गरमा दिया है।








