यूनियन बैंक ऑफ इंडिया की कर्मचारी और विश्व प्रसिद्ध दृष्टिबाधित पर्वतारोही छोंजिन आंगमो ने अफ्रीका की सबसे ऊंची चोटी माउंट किलिमंजारो (5,895 मीटर) पर सफलतापूर्वक चढ़ाई कर एक नया इतिहास रच दिया है। पहले ही माउंट एवरेस्ट और माउंट एल्ब्रुस को फतह कर विश्व रिकॉर्ड बना चुकी आंगमो अब “रूफ ऑफ अफ्रीका” पर भी तिरंगा फहराने वाली एकमात्र दृष्टिबाधित महिला बन गई हैं।
बेहद खराब मौसम में पूरी की चुनौतीपूर्ण चढ़ाई
यह अभियान बेहद कठिन और अप्रत्याशित मौसम परिस्थितियों में पूरा किया गया। भारी बर्फबारी, अत्यधिक ठंड और खराब दृश्यता के बावजूद आंगमो ने अदम्य साहस का परिचय देते हुए शिखर तक पहुंचने का लक्ष्य हासिल किया।
लेमोशो रूट से की गई खतरनाक चढ़ाई
हालांकि माउंट किलिमंजारो को आमतौर पर ट्रेकिंग पर्वत माना जाता है, लेकिन इस बार लेमोशो रूट से की गई चढ़ाई बेहद चुनौतीपूर्ण रही। रास्ते में टीम को बर्फीले तूफान, तेज़ हवाओं और बेहद कम तापमान का सामना करना पड़ा।
यूनियन बैंक ऑफ इंडिया ने दिया पूरा सहयोग
इस ऐतिहासिक अभियान में यूनियन बैंक ऑफ इंडिया ने छोंजिन आंगमो को पूर्ण वित्तीय सहयोग प्रदान किया। बैंक ने इस उपलब्धि पर उन्हें हार्दिक बधाई देते हुए इसे पूरे देश के लिए गर्व का विषय बताया।
बूट्स एंड क्रैम्पन्स ने दी तकनीकी सहायता
इस अभियान में प्रसिद्ध पर्वतारोहण कंपनी बूट्स एंड क्रैम्पन्स ने तकनीकी सहयोग दिया। अनुभवी गाइड्स की टीम, आधुनिक उपकरण और आंगमो का व्यापक पर्वतारोहण अनुभव इस चुनौतीपूर्ण यात्रा को सुरक्षित और सफल बनाने में अहम रहा।
किन्नौर की बेटी बनी दुनिया के लिए प्रेरणा
हिमाचल प्रदेश के किन्नौर के ऊबड़-खाबड़ पहाड़ी इलाके से निकलकर दुनिया की सबसे ऊंची चोटियों को फतह करने वाली छोंजिन आंगमो आज दिव्यांग समुदाय के लिए वैश्विक प्रेरणा बन चुकी हैं।
“विजन” का मतलब बदला: हिम्मत, लगन और आत्मविश्वास
हर अभियान के साथ छोंजिन आंगमो यह साबित कर रही हैं कि “विजन” केवल आंखों से देखने का नाम नहीं, बल्कि हिम्मत, लगन, आत्मविश्वास और जज्बे का दूसरा नाम है।
दुनिया को दिया मजबूत संदेश
किलिमंजारो समिट के बाद आंगमो ने एक बार फिर यह संदेश दिया है कि सीमाएं वही होती हैं, जहां विश्वास खत्म हो जाता है। उनका सफर यह दिखाता है कि अगर इरादे मजबूत हों तो कोई भी बाधा बड़ी नहीं होती।
दिव्यांगजनों के लिए बनी उम्मीद की किरण
छोंजिन आंगमो की यह उपलब्धि न केवल खेल जगत में, बल्कि सामाजिक सोच में भी बड़ा बदलाव ला रही है। वह यह सिद्ध कर रही हैं कि दिव्यांगता कमजोरी नहीं, बल्कि एक अलग तरह की ताकत है।










