सर्दी के दस्तक देने के बावजूद गाजियाबाद में डेंगू का प्रकोप थमने का नाम नहीं ले रहा है। जिले में अब तक 329 लोग डेंगू की चपेट में आ चुके हैं, जो न सिर्फ पिछले वर्ष के आंकड़ों को पीछे छोड़ चुका है, बल्कि नगर निगम के ‘पूर्ण नियंत्रण’ के दावों को भी खोखला साबित कर रहा है।
स्वास्थ्य विभाग के अनुसार नवंबर माह में ही 150 से अधिक नए मामले सामने आए हैं। इंदिरापुरम, वैशाली, क्रॉसिंग रिपब्लिक, साहिबाबाद और कविनगर जैसे घनी आबादी वाले इलाकों से सबसे ज्यादा मरीज रिपोर्ट हुए हैं।
अस्पतालों में बढ़ता दबाव
जिला अस्पताल और निजी चिकित्सालयों में डेंगू मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। वर्तमान में करीब 20 से 25 मरीज भर्ती हैं, जिनमें कई की हालत गंभीर बताई जा रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि वास्तविक आंकड़े इससे कहीं ज्यादा हो सकते हैं, क्योंकि कई मरीज प्राइवेट क्लिनिकों में इलाज करा रहे हैं।
निगम के दावे फेल, जनता में आक्रोश
नगर निगम द्वारा जुलाई-अगस्त में लार्वा नष्ट करने और फॉगिंग के जरिए डेंगू नियंत्रण के दावे किए गए थे, लेकिन जमीनी हकीकत इसके विपरीत नजर आ रही है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि जलभराव, गंदे नाले और खुले कूड़े के ढेर अभी भी मच्छरों के लिए अनुकूल वातावरण बना रहे हैं।
इंदिरापुरम RWA अध्यक्ष ने कहा:
“हमने कई बार शिकायतें कीं, लेकिन कार्रवाई नहीं हुई। अब डेंगू फैला तो जिम्मेदारी किसकी?”
स्वास्थ्य विभाग की प्रतिक्रिया
सहायक मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. आर.के. गुप्ता ने बताया:
“हम रैपिड रिस्पॉन्स टीमों के जरिए रोजाना सर्विलांस कर रहे हैं। हर पॉजिटिव केस के आसपास छिड़काव और मच्छर नियंत्रण अभियान चलाया जा रहा है, लेकिन मौसम परिवर्तन और शहरीकरण चुनौतियां बढ़ा रहे हैं।”
पिछले वर्षों का तुलनात्मक आंकड़ा
| वर्ष | डेंगू मामले |
|---|---|
| 2022 | 901 |
| 2023 | 662 |
| 2024 | 196 |
| 2025 (नवंबर तक) | 329 |
➡️ 2025 के आंकड़े पहले ही 2024 को पीछे छोड़ चुके हैं और सीजन अभी समाप्त नहीं हुआ।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार उत्तर प्रदेश में 2025 में डेंगू मामलों में 50% से अधिक वृद्धि दर्ज की गई है, जिसमें गाजियाबाद प्रमुख जिलों में शामिल है।
क्या करें बचाव के लिए
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घर में पानी जमा न होने दें
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कूलर-पानी की टंकियां ढककर रखें
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फुल स्लीव कपड़े पहनें
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मच्छरदानी का प्रयोग करें
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बुखार होने पर तुरंत जांच कराएं
निष्कर्ष
गाजियाबाद में डेंगू अब केवल स्वास्थ्य समस्या नहीं, बल्कि प्रशासनिक विफलता का सवाल बन चुका है। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले दिनों में स्थिति और भयावह हो सकती है।










