मयंक गुप्ता गाजियाबाद
Ghaziabad नगर निगम और एक आम नागरिक के बीच का विवाद एक बार फिर सुर्खियों में है। इस बार मामला अमित किशोर नामक व्यक्ति से जुड़ा है, जिन्हें नगर निगम ने “पेशेवर शिकायतकर्ता” करार देते हुए उनके आरोपों को सिरे से खारिज किया है।
निगम का दावा है कि अमित ने निजी कारणों से और निगम की छवि को धूमिल करने के इरादे से शिकायत दर्ज की है। इस विवाद ने एक बार फिर सवाल खड़ा किया है कि क्या शिकायत करने वाला नागरिक हमेशा ही निगम के निशाने पर आ जाता है?
अमित किशोर की शिकायत और निगम का जवाब
अमित किशोर ने अपनी शिकायत में जलभराव के कारण गाड़ी खराब होने का दावा किया था। उनकी शिकायत के साथ दी गई तस्वीर में एक गाड़ी दिखाई गई, जिसका नंबर दिल्ली का है। निगम ने इस तस्वीर का हवाला देते हुए कहा कि गाड़ी के टायर तक भी पानी नहीं था, और यह साबित नहीं हुआ कि गाड़ी की खराबी जलभराव के कारण हुई। निगम ने इसे एक सुनियोजित प्रयास करार देते हुए कहा कि शहर में ऐसा कोई अन्य मामला सामने नहीं आया।
निगम ने अपने जवाब में यह भी स्पष्ट किया कि रिकॉर्ड बारिश के बावजूद, उनकी टीम ने अथक प्रयासों से शहर को जलभराव से बचाने का काम किया। Ghaziabad में नालों की समयबद्ध सफाई, ड्रोन मॉनिटरिंग और जल निकासी के लिए पंप सेट की व्यवस्थाओं का हवाला देते हुए निगम ने दावा किया कि गाजियाबाद में एनसीआर के अन्य शहरों की तुलना में सबसे कम जलभराव देखा गया।
शिकायतकर्ता पर सवाल, लेकिन जवाब अधूरे
निगम का यह रवैया नया नहीं है। अक्सर देखा गया है कि जब कोई नागरिक शिकायत करता है, तो निगम उसकी मंशा पर सवाल उठाकर मामले को कमजोर करने की कोशिश करता है।
अमित किशोर को “पेशेवर शिकायतकर्ता” कहकर निगम ने उनके दावों को खारिज करने की कोशिश की, लेकिन यह सवाल अनुत्तरित रहा कि क्या उनकी शिकायत में कोई सच्चाई थी? गाड़ी के खराब होने का कारण भले ही विवादास्पद हो, लेकिन जलभराव की समस्या से Ghaziabad वासी अक्सर जूझते हैं।
जलभराव: बढ़ते शहरीकरण की देन
निगम ने यह स्वीकार किया कि बढ़ता शहरीकरण और क्षमता से अधिक बिल्डिंग्स का निर्माण नालों पर दबाव डाल रहा है। यह एक ऐसी सच्चाई है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। शहर में नालों की क्षमता सीमित है, और अनियोजित निर्माण ने इस समस्या को और गंभीर कर दिया है। निगम का दावा है कि वह इस समस्या से निपटने के लिए तत्पर है, लेकिन क्या ये प्रयास पर्याप्त हैं?
नागरिक बनाम निगम: एक अंतहीन जंग
अमित किशोर का मामला केवल एक शिकायत का नहीं, बल्कि नागरिक और प्रशासन के बीच विश्वास की कमी का प्रतीक है। निगम की ओर से शिकायतकर्ता की मंशा पर सवाल उठाना आसान है, लेकिन यह समस्या का समाधान नहीं है।
गाजियाबाद जैसे तेजी से विकसित हो रहे शहर में जलभराव, सड़क, और बुनियादी ढांचे से जुड़ी समस्याएं आम हैं। ऐसे में, निगम को शिकायतों को गंभीरता से लेते हुए ठोस समाधान की दिशा में काम करना होगा।
आगे की राह
Ghaziabad नगर निगम ने जलभराव से निपटने के लिए कई कदम उठाए हैं, जैसे नालों की सफाई, ड्रोन मॉनिटरिंग, और पंप सेट की व्यवस्था। लेकिन इन प्रयासों का प्रभाव तभी दिखेगा, जब शहरीकरण की चुनौतियों से निपटने के लिए दीर्घकालिक योजनाएं बनें।
साथ ही, निगम को शिकायतकर्ताओं को “पेशेवर” करार देने के बजाय उनकी बात सुनने और समाधान निकालने की दिशा में काम करना चाहिए।
अमित किशोर का मामला शायद एक छोटा सा उदाहरण हो, लेकिन यह उस बड़ी तस्वीर की ओर इशारा करता है, जहां नागरिक और प्रशासन के बीच संवाद की कमी साफ दिखती है।
क्या निगम इस मौके को एक अवसर के रूप में लेगा और नागरिकों का भरोसा जीतेगा, या फिर शिकायतकर्ताओं को सवालों के घेरे में खड़ा करना ही उसकी रणनीति बनी रहेगी? यह समय ही बताएगा।











