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हरीश राणा पैसिव यूथेनेशिया केस: सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा, ऐतिहासिक निर्णय की उम्मीद

BPC News National Desk
4 Min Read

सुप्रीम कोर्ट ने आज गाजियाबाद निवासी हरीश राणा की पैसिव यूथेनेशिया (निष्क्रिय इच्छामृत्यु) याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने विस्तृत सुनवाई के बाद आदेश रिजर्व किया। यह फैसला न केवल हरीश के परिवार, बल्कि भारत में गरिमापूर्ण मृत्यु (Right to Die with Dignity) के अधिकार और इच्छामृत्यु के कानूनी ढांचे के लिए भी बेहद अहम माना जा रहा है।

13 साल से कोमा में, 100% दिव्यांग

हरीश राणा (32 वर्ष) वर्ष 2013 में चंडीगढ़ में एक पेइंग गेस्ट हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद गंभीर सिर की चोट लगने से स्थायी वेजिटेटिव स्टेट (Permanent Vegetative State) में चले गए थे। तब से वे 13 वर्षों से अधिक समय से अचेत अवस्था में हैं।
उन्हें:

  • क्वाड्रिप्लेजिया (चारों अंगों में लकवा),

  • 100% दिव्यांगता,

  • और शरीर को जीवित रखने के लिए कृत्रिम जीवन सहायता (फीडिंग ट्यूब, ब्लैडर व बॉवेल मैनेजमेंट) की जरूरत है।

एम्स (AIIMS) की मेडिकल रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि उनके ठीक होने की कोई संभावना नहीं है।

परिवार की भावुक अपील

हरीश के पिता अशोक राणा ने पहले 2024 में दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी, जो खारिज हो गई। इसके बाद परिवार सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
13 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने हरीश के माता-पिता और छोटे भाई से व्यक्तिगत रूप से मुलाकात की। परिवार ने भावुक होकर कहा:

बेटे को और दर्द न दिया जाए, इलाज से कोई फायदा नहीं हो रहा। भावनात्मक और आर्थिक बोझ असहनीय हो गया है।

सुनवाई के दौरान कोर्ट की अहम टिप्पणियां

सुनवाई में केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी और याचिकाकर्ता की ओर से वकील रश्मि नंदकुमार ने पक्ष रखा।

बेंच ने “पैसिव यूथेनेशिया” शब्द के प्रयोग पर आपत्ति जताते हुए कहा कि मामला “जीवन रक्षक उपचार हटाने” से जुड़ा है और इसे मेडिकल एंगल से देखा जाएगा।

जस्टिस पारदीवाला की अहम टिप्पणी:

  • हम कौन होते हैं यह तय करने वाले कि कौन जिए या मरे?

  • हम इस बच्चे को हमेशा के लिए ऐसे नहीं रख सकते।

कोर्ट ने कहा कि यह अत्यंत संवेदनशील मुद्दा है और इस पर गहराई से विचार किया जाएगा।

कानून और पृष्ठभूमि

  • अरुणा शानबाग केस (2011) में पहली बार सुप्रीम कोर्ट ने सीमित परिस्थितियों में पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति दी थी।

  • कॉमन कॉज बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2018) मामले में कोर्ट ने अनुच्छेद 21 के तहत गरिमापूर्ण मृत्यु के अधिकार को मौलिक अधिकार माना और सख्त दिशानिर्देशों के साथ पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति दी।

यदि हरीश राणा की याचिका स्वीकार होती है, तो यह भारत में पहला ज्ञात मामला होगा जहां अदालत द्वारा किसी व्यक्ति के लिए पैसिव यूथेनेशिया की स्पष्ट अनुमति दी जाएगी।

लाखों परिवारों के लिए मिसाल

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला:

  • लंबे समय से वेजिटेटिव स्टेट में पड़े मरीजों के परिजनों के लिए नजीर (precedent) बनेगा,

  • और ‘दर्दनाक जीवन’ बनाम ‘गरिमापूर्ण मृत्यु’ की बहस को नई दिशा देगा।

गाजियाबाद और दिल्ली सहित देशभर के लोग इस फैसले का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं। आने वाले दिनों में सुप्रीम कोर्ट का निर्णय भारत में इच्छामृत्यु के कानून को नई परिभाषा दे सकता है।

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