उत्तर प्रदेश के बदायूं जिले से सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था को कटघरे में खड़ा करने वाला मामला सामने आया है। जिला महिला अस्पताल के स्पेशल न्यूबॉर्न केयर यूनिट (SNCU) वार्ड में नवजात शिशुओं के इलाज के नाम पर खुलेआम रिश्वतखोरी और शोषण के गंभीर आरोप लगाए गए हैं।
परिजनों का आरोप है कि बिना “चढ़ावा” दिए यहां इलाज नहीं किया जाता। हर शिफ्ट में तैनात स्टाफ द्वारा नवजात के माता-पिता से पैसों की मांग की जाती है, जिससे सरकारी अस्पताल में इलाज प्राइवेट अस्पताल से भी अधिक महंगा साबित हो रहा है।
2000 रुपये देने पर तुरंत मिलता है बेड
कागजों में SNCU वार्ड के बेड हमेशा भरे हुए दिखाए जाते हैं, लेकिन आरोप है कि 2000 रुपये देने पर तुरंत बेड उपलब्ध करा दिया जाता है। वहीं, पैसे न होने पर परिजनों को “बेड खाली नहीं है” कहकर लौटा दिया जाता है।
मुफ्त सुविधाओं के बावजूद बाहर से मंगवाया जाता है दूध
भर्ती के बाद भी शोषण खत्म नहीं होता। परिजनों का कहना है कि उनसे बाहर की दुकानों से 600-600 रुपये का दूध मंगवाया जाता है, जबकि सरकार द्वारा नवजातों के लिए दूध और अन्य आवश्यक सामग्री मुफ्त उपलब्ध कराई जाती है।
इसके अलावा हर शिफ्ट में चाय, कॉफी और नाश्ते के लिए भी दबाव बनाया जाता है।
पैसे न देने पर रेफर करने की धमकी
यदि अलग-अलग शिफ्ट के कर्मचारियों को पैसे नहीं दिए जाते, तो परिजनों को डराया-धमकाया जाता है और कहा जाता है कि बच्चे की हालत गंभीर है और उसे रेफर करना पड़ेगा।
नवजात की बिगड़ती हालत, परिजन गिड़गिड़ाते रहे
हाल ही में सामने आए एक दर्दनाक मामले में मुजरिया थाना क्षेत्र के गांव समसपुर निवासी हरवीर की पत्नी रिया ने 9 दिसंबर को निजी नर्सिंग होम में बच्चे को जन्म दिया। नवजात की हालत नाजुक होने पर उसे SNCU वार्ड में भर्ती कराया गया।
आरोप है कि स्टाफ ने 1500 रुपये की मांग की, जिसे परिवार पूरा नहीं कर सका। इलाज में देरी से नवजात की हालत बिगड़ गई और दूध पिलाते समय उसके मुंह से खून निकलने लगा।
नवजात की नानी मुन्नी देवी स्टाफ के सामने रोती-गिड़गिड़ाती रहीं, लेकिन पैसे की मांग जारी रही।
गरीब परिवारों के लिए बोझ बनी सरकारी सुविधा
जिला महिला अस्पताल की दूसरी मंजिल पर स्थित SNCU वार्ड में 12 नवजातों की भर्ती क्षमता है, लेकिन लगभग हर परिवार से पैसों की मांग की शिकायतें सामने आ रही हैं। गरीब परिवारों के लिए यह सरकारी सुविधा अब राहत नहीं, बोझ बनती जा रही है।
जांच और कार्रवाई की मांग
यह मामला स्वास्थ्य सेवाओं में व्याप्त भ्रष्टाचार को उजागर करता है, जहां मुफ्त इलाज की सरकारी योजनाएं कागजों तक सीमित रह गई हैं। पीड़ितों ने उच्च अधिकारियों से निष्पक्ष जांच और सख्त कार्रवाई की मांग की है, ताकि भविष्य में किसी नवजात की जान पैसों की भेंट न चढ़े।










