दिसंबर 2025 में रूस से कच्चा तेल खरीदने को लेकर भारत की स्थिति में बड़ा बदलाव आया है। यूरोप स्थित रिसर्च संस्थान CREA (Centre for Research on Energy and Clean Air) की ताजा मासिक रिपोर्ट के अनुसार, भारत अब रूस के हाइड्रोकार्बन (फॉसिल फ्यूल) का तीसरा सबसे बड़ा खरीदार बन गया है। इससे पहले भारत लगातार दूसरे स्थान पर था, लेकिन अब तुर्की ने उसे पीछे छोड़ दिया है।
आयात में तेज गिरावट, 30% से ज्यादा की कमी
CREA की रिपोर्ट बताती है कि दिसंबर 2025 में भारत ने रूस से कुल 2.3 अरब यूरो (करीब 20,000 करोड़ रुपये) के हाइड्रोकार्बन आयात किए। यह आंकड़ा नवंबर 2025 के 3.3 अरब यूरो से लगभग 1 अरब यूरो कम है, यानी 30% से अधिक की गिरावट।
इन आयातों में:
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कच्चा तेल – 78% हिस्सा, लगभग 1.8 अरब यूरो
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कोयला – 424 मिलियन यूरो
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तेल उत्पाद – 82 मिलियन यूरो
शामिल रहे।
रिपोर्ट के मुताबिक, दिसंबर में भारत का रूसी कच्चे तेल का आयात 29% महीने-दर-महीने घटा, जो G7 देशों की प्राइस कैप नीति लागू होने के बाद सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया। भारत ने दिसंबर में सिर्फ 1.2 मिलियन बैरल रूसी क्रूड आयात किया, जबकि नवंबर में यह 1.8 मिलियन बैरल था।
रैंकिंग में बड़ा बदलाव
CREA के आंकड़ों के अनुसार:
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चीन अब भी रूस का सबसे बड़ा खरीदार बना हुआ है। उसने दिसंबर में टॉप-5 आयातकों से रूस की कुल कमाई का 48% (करीब 6 अरब यूरो) खरीदा।
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तुर्की दूसरे स्थान पर पहुंच गया, जिसने 2.6 अरब यूरो के हाइड्रोकार्बन खरीदे।
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भारत तीसरे स्थान पर खिसक गया।
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इसके बाद दक्षिण कोरिया, ताइवान और अन्य देश हैं।
गिरावट की वजह: रिफाइनरियों की कटौती और अमेरिकी प्रतिबंध
इस गिरावट का मुख्य कारण भारत की बड़ी रिफाइनरियों द्वारा रूसी क्रूड खरीद में की गई भारी कटौती है।
रिपोर्ट के मुताबिक:
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रिलायंस इंडस्ट्रीज की जामनगर रिफाइनरी ने दिसंबर में रूसी क्रूड आयात 49% तक घटाया।
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सरकारी रिफाइनरियों (IOCL, BPCL, HPCL) ने लगभग 15% की कटौती की।
यह कदम हाल ही में लगाए गए अमेरिकी प्रतिबंधों (US OFAC sanctions) के बाद उठाया गया, जिनमें रूस की प्रमुख तेल कंपनियां Rosneft और Lukoil शामिल हैं। इन प्रतिबंधों से आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित हुई, जिसके कारण भारतीय कंपनियां सतर्क हो गईं और पहले से खरीदे गए कार्गो पर अधिक निर्भर रहीं।
हालांकि, भारत का कुल क्रूड आयात दिसंबर में थोड़ा बढ़ा, लेकिन रूस का हिस्सा घटकर 25% रह गया, जो नवंबर में 35% था।
2025 का कुल आंकड़ा और 2026 में रिकवरी के संकेत
पूरे 2025 में भारत ने रूस से 20.4 मिलियन बैरल से अधिक क्रूड आयात किया। वहीं जनवरी 2026 के शुरुआती आंकड़े संकेत देते हैं कि स्थिति में सुधार आ रहा है।
13 जनवरी 2026 तक ही भारत 1.1 मिलियन बैरल से अधिक रूसी क्रूड आयात कर चुका है, जो दर्शाता है कि आने वाले महीनों में आयात फिर से बढ़ सकता है।
निहितार्थ: ऊर्जा सुरक्षा बनाम भू-राजनीति
यह घटनाक्रम दिखाता है कि भू-राजनीतिक प्रतिबंध और वैश्विक ऊर्जा बाजार कितनी तेजी से बदल सकते हैं। यूक्रेन युद्ध के बाद भारत ने रूस से सस्ता क्रूड खरीदकर अपनी ऊर्जा सुरक्षा मजबूत की और विदेशी मुद्रा की बचत की।
लेकिन अब:
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भारतीय रिफाइनरियां इराक, सऊदी अरब और अन्य स्रोतों पर ज्यादा निर्भर हो रही हैं।
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CREA की रिपोर्ट यह भी बताती है कि रूस की फॉसिल फ्यूल निर्यात आय में मामूली गिरावट (करीब 500 मिलियन यूरो प्रतिदिन) आई है, जो युद्ध के बाद के सबसे निचले स्तरों में से एक है।
आगे क्या?
विशेषज्ञों का मानना है कि 2026 में भारत-रूस ऊर्जा व्यापार में फिर से तेजी आ सकती है, क्योंकि:
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वैकल्पिक आपूर्तिकर्ताओं से समझौते,
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नए शिपिंग और पेमेंट मैकेनिज्म,
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और वैश्विक बाजार में बदलाव
सामने आ रहे हैं।
फिलहाल, भारत का तीसरे स्थान पर खिसकना एक संकेतक बदलाव है, जो बताता है कि ऊर्जा व्यापार में स्थिरता अब पूरी तरह से भू-राजनीति पर निर्भर होती जा रही है।







