पर्यावरण संरक्षण, स्वदेशी उत्पादन को बढ़ावा और गोबर के उपयोग को बढ़ाने के उद्देश्य से गाजियाबाद नगर निगम ने लगभग 50 लाख रुपये की लागत से गोबर आधारित प्राकृतिक पेंट बनाने का प्लांट स्थापित किया था। यह प्लांट नंदी पार्क गोशाला परिसर में खादी इंडिया के सहयोग से सितंबर 2025 में शुरू हुआ था।
लेकिन प्रोजेक्ट शुरू होने के कुछ ही महीनों बाद अब यह प्लांट उपेक्षा और सीमित उपयोग का शिकार होता दिखाई दे रहा है। नगर निगम खुद अपने दफ्तरों में इस सस्ते, पर्यावरण-अनुकूल और टिकाऊ पेंट का इस्तेमाल करने से कतरा रहा है।
महंगे निजी ब्रांडों को मिल रही प्राथमिकता
नगर निगम मुख्यालय नवयुग मार्केट में इन दिनों चल रही पुताई के लिए जापानी कंपनी सहित कई निजी ब्रांडों के महंगे पेंट खरीदे जा रहे हैं।
यह स्थिति तब है जब नगर निगम के पास खुद का तैयार किया गया इको-फ्रेंडली गोबर पेंट उपलब्ध है।
इससे यह सवाल उठ रहा है कि जब निगम ने खुद इस परियोजना पर लाखों रुपये खर्च किए, तो वह इसे उपयोग में क्यों नहीं ला रहा?
चार महीने में उत्पादन सीमित, उपयोग लगभग शून्य
सूत्रों के अनुसार, प्लांट शुरू हुए चार महीने से अधिक समय हो चुका है, लेकिन उत्पादन अभी तक सीमित स्तर पर ही हो पाया है।
इतना ही नहीं, निगम के अंदरूनी विभागों में भी इस पेंट का उपयोग बहुत कम किया गया है, जिससे परियोजना की सफलता पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
‘ग्रीन’ पहल की विश्वसनीयता पर उठे सवाल
गोबर पेंट को शुरुआत में कई खासियतों के साथ प्रचारित किया गया था:
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प्राकृतिक और पर्यावरण-अनुकूल
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एंटी-फंगल और एंटी-बैक्टीरियल गुण
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कम लागत में उपलब्ध
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टिकाऊ और सुरक्षित
लेकिन अब निगम द्वारा विदेशी और निजी ब्रांडों को प्राथमिकता देने से स्थानीय लोगों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं में निराशा देखने को मिल रही है।
क्या सिर्फ दिखावा था यह प्रोजेक्ट?
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यदि निगम खुद ही इस पेंट का उपयोग नहीं करेगा, तो जनता में इसके प्रति विश्वास कैसे पैदा होगा?
कई लोगों का मानना है कि यह परियोजना सिर्फ कागजों तक सीमित रह जाने का खतरा झेल रही है।
अधिकारियों का क्या कहना है?
नगर निगम अधिकारियों के अनुसार:
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प्लांट में उत्पादन जारी है
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विभिन्न विभागों में उपयोग बढ़ाने की योजना है
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गुणवत्ता और उपलब्धता से जुड़े तकनीकी कारणों के चलते मुख्यालय में अभी पारंपरिक पेंट का इस्तेमाल किया जा रहा है
हालांकि, अधिकारियों की इस सफाई के बावजूद, 50 लाख के निवेश के बाद भी सीमित उपयोग सवाल खड़े कर रहा है।
कार्यान्वयन की कमी बनी बड़ी चुनौती
यह मामला स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि किसी भी परियोजना की सफलता केवल शुरुआत से नहीं, बल्कि उसके सतत कार्यान्वयन और प्रतिबद्धता से तय होती है।
यदि जल्द ही इस प्लांट के उत्पादों को प्राथमिकता नहीं दी गई, तो ‘गोबर पेंट’ परियोजना सिर्फ एक असफल सरकारी प्रयोग बनकर रह सकती है।
निष्कर्ष
गाजियाबाद नगर निगम का गोबर पेंट प्लांट पर्यावरण और स्वदेशी उत्पादन की दिशा में एक सराहनीय पहल थी। लेकिन वर्तमान स्थिति बताती है कि नीति और क्रियान्वयन के बीच बड़ा अंतर मौजूद है।
उम्मीद की जा रही है कि नगर निगम जल्द ही अपने ही उत्पाद को बढ़ावा देगा, जिससे यह परियोजना वास्तव में सफल बन सके।







