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वंदे मातरम् पर नया विवाद: AIMIM नेता शोएब जमई के बयान से सियासी हलचल

BPC News National Desk
4 Min Read

राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ को लेकर केंद्र सरकार के नए दिशानिर्देशों के बाद देश में एक बार फिर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने हाल ही में आदेश जारी किया है कि सभी सरकारी कार्यक्रमों, स्कूलों और आधिकारिक आयोजनों में राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ से पहले वंदे मातरम् के पूरे छह छंद गाए या बजाए जाएंगे।

सरकार के इस फैसले का AIMIM नेता डॉ. शोएब जमई ने तीखा विरोध किया है, जिससे राजनीतिक माहौल गरमा गया है।

क्या है सरकार का नया आदेश?

गृह मंत्रालय के अनुसार:

  • सभी सरकारी कार्यक्रमों में वंदे मातरम् का पूर्ण संस्करण (लगभग 3 मिनट 10 सेकंड) बजाया जाएगा

  • राष्ट्रगान से पहले इसे अनिवार्य रूप से शामिल किया जाएगा

  • स्कूलों में सुबह की सभा में सामूहिक गायन को प्रोत्साहित किया गया है

सरकार का कहना है कि यह कदम राष्ट्रीय गौरव और एकता को मजबूत करने के उद्देश्य से उठाया गया है।

AIMIM नेता का विवादित बयान

AIMIM के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष डॉ. शोएब जमई ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट करते हुए कहा:

“वंदे मातरम् न राष्ट्रीय गान है और न ही संविधान का हिस्सा। लोग अपनी आस्था के अनुसार इसे गाते थे, लेकिन अब इसे जबरन थोपने की कोशिश की जा रही है। हमारी गर्दन पर छुरी भी रख दोगे तब भी हम इसे नहीं गाएंगे।”

उनका यह बयान तेजी से वायरल हो गया और देशभर में राजनीतिक प्रतिक्रियाएं सामने आने लगीं।

धार्मिक स्वतंत्रता बनाम राष्ट्रवाद की बहस

जमई ने अपने बयान में कहा कि:

  • वंदे मातरम् को अनिवार्य बनाना “तानाशाही” है

  • यह संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन है

  • इसे मुसलमानों पर जबरन थोपने की कोशिश की जा रही है

वहीं, कई राजनीतिक दलों और संगठनों ने उनके बयान को राष्ट्र विरोधी बताया है।

समर्थन और विरोध – दोनों तेज

इस मुद्दे पर देश में दो स्पष्ट पक्ष बन गए हैं:

विरोध करने वालों का तर्क:

  • यह धार्मिक स्वतंत्रता का मामला है

  • संविधान में इसे अनिवार्य नहीं किया गया

  • जबरन लागू करना लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ

समर्थन करने वालों का तर्क:

  • वंदे मातरम् स्वतंत्रता आंदोलन का प्रतीक है

  • यह राष्ट्रीय सम्मान और एकता से जुड़ा है

  • इसे गाने में किसी धर्म का विरोध नहीं

वंदे मातरम् का ऐतिहासिक संदर्भ

  • रचना: बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय

  • स्वतंत्रता संग्राम के दौरान प्रेरणा का प्रमुख स्रोत

  • 1950 में संविधान सभा ने इसे राष्ट्रगीत का दर्जा दिया

  • आधिकारिक रूप से केवल पहले दो छंद मान्य थे

नए आदेश में पूरे छह छंदों को शामिल करने की बात कही गई है, जिससे पुराना विवाद फिर सामने आ गया है।

राजनीतिक असर और आगे की स्थिति

इस विवाद ने एक बार फिर राष्ट्रवाद, धर्म और संवैधानिक अधिकारों के बीच बहस को तेज कर दिया है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह मुद्दा आने वाले समय में राजनीतिक रूप से और गर्मा सकता है, खासकर चुनावी माहौल में।

निष्कर्ष

वंदे मातरम् को लेकर यह नया विवाद बताता है कि भारत में राष्ट्रीय प्रतीकों और धार्मिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन का सवाल अभी भी संवेदनशील बना हुआ है।

आने वाले दिनों में सरकार और विपक्ष की प्रतिक्रिया से यह मुद्दा और ज्यादा राजनीतिक रंग ले सकता है।

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