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अब खत्म होगी मिडिल-ईस्ट में जंग? ट्रंप के प्रस्ताव के बाद ईरान ने अमेरिका के सामने रखीं शर्तें

BPC News National Desk
6 Min Read

मिडिल ईस्ट में जारी भीषण संघर्ष ने पूरे क्षेत्र को अस्थिर कर दिया है। अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच चल रहा युद्ध अब चौथे सप्ताह में प्रवेश कर चुका है।

इस संघर्ष का असर केवल क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था भी इससे प्रभावित हो रही है। खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य के जरिए तेल आपूर्ति बाधित होने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में अस्थिरता बढ़ गई है।

ऐसे में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शांति की मांग तेज हो गई है और दुनिया की नजरें अब कूटनीतिक प्रयासों पर टिकी हुई हैं।

ट्रंप का शांति प्रस्ताव और दावा

डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में दावा किया है कि वॉशिंगटन और तेहरान के बीच “बहुत अच्छी और उत्पादक” बातचीत चल रही है।

उन्होंने अपने बयान में कहा कि इस पूरे सप्ताह वार्ता जारी रहेगी और युद्ध का “पूर्ण समाधान” संभव है।

ट्रंप ने यह भी घोषणा की कि अमेरिका फिलहाल हमलों में ब्रेक ले रहा है ताकि बातचीत को आगे बढ़ाया जा सके।

इसके साथ ही उन्होंने अपने विशेष दूत स्टीव विटकोफ और दामाद जारेड कुश्नर को ईरान के साथ बातचीत का जिम्मा सौंपा है।

ट्रंप का दावा है कि दोनों पक्षों के बीच “मुख्य बिंदुओं पर लगभग पूर्ण सहमति” बन रही है, जिसमें ईरान का परमाणु कार्यक्रम छोड़ना और होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलना शामिल है।

ईरान ने अमेरिका के सामने रखीं ये शर्तें

हालांकि ईरान ने इन दावों की पुष्टि नहीं की है, लेकिन रिपोर्ट्स के अनुसार उसने अमेरिका के सामने कई कड़ी और स्पष्ट शर्तें रखी हैं।

इन शर्तों में शामिल हैं:

  • खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को पूरी तरह बंद करना
  • सभी आर्थिक प्रतिबंधों को तुरंत हटाना
  • हिज्बुल्लाह के खिलाफ इजरायल के सैन्य अभियान को रोकना
  • होर्मुज जलडमरूमध्य पर ईरान को नियंत्रण और गुजरने वाले जहाजों से शुल्क वसूलने की अनुमति
  • भविष्य में ईरान पर कभी हमला न करने की ठोस सुरक्षा गारंटी
  • युद्ध में हुए नुकसान के लिए वित्तीय मुआवजा
  • पांच वर्षों तक बैलिस्टिक मिसाइल विकास को सीमित करना
  • यूरेनियम संवर्धन कम करने की तत्परता
  • अंतरराष्ट्रीय परमाणु एजेंसी को सेंट्रीफ्यूज का निरीक्षण करने की अनुमति
  • पूरे पश्चिम एशिया में प्रॉक्सी समूहों को फंडिंग रोकने पर सहमति

ईरान का कहना है कि ये शर्तें तभी लागू हो सकती हैं जब उसकी संप्रभुता और वैध अधिकारों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार किया जाए।

पहले भी रखी गई थीं अहम शर्तें

इससे पहले मसूद पेजेश्कियन ने 12 मार्च को स्पष्ट किया था कि युद्ध खत्म करने के लिए तीन बुनियादी शर्तें पूरी होनी चाहिए।

इनमें शामिल हैं:

  • ईरान के वैध अधिकारों को अंतरराष्ट्रीय मान्यता
  • युद्ध में हुए नुकसान का पूरा हर्जाना
  • भविष्य में किसी भी हमले के खिलाफ पक्की अंतरराष्ट्रीय गारंटी

यह बयान उस समय आया था जब ईरान के कई शीर्ष राजनयिक अमेरिका के साथ बातचीत से इनकार कर चुके थे।

क्या वाकई बातचीत आगे बढ़ेगी?

ट्रंप प्रशासन द्वारा 15-पॉइंट प्लान भेजने की खबरें भी सामने आई हैं, जिसमें परमाणु हथियारों से दूरी, यूरेनियम स्टॉक का नियंत्रण और क्षेत्रीय स्थिरता शामिल है।

हालांकि, तेहरान की ओर से अभी तक किसी औपचारिक वार्ता की पुष्टि नहीं की गई है।

इसके उलट, ईरान ने चेतावनी दी है कि अगर अमेरिका ने सैन्य हमले बढ़ाए, तो वह क्षेत्रीय बुनियादी ढांचे को निशाना बना सकता है।

इस बीच इजरायल की ओर से हमले जारी हैं और ईरान भी जवाबी मिसाइल हमले कर रहा है, जिससे तनाव और बढ़ गया है।

वैश्विक असर और तेल संकट

होर्मुज जलडमरूमध्य में बढ़ते तनाव का सीधा असर वैश्विक तेल आपूर्ति पर पड़ा है।

तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर पहुंच चुकी हैं, जिससे भारत समेत कई देशों की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ रहा है।

ऊर्जा सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ती जा रही हैं और कई देश वैकल्पिक आपूर्ति स्रोतों की तलाश में जुट गए हैं।

विश्लेषकों की राय

विश्लेषकों का मानना है कि दोनों पक्ष लंबे संघर्ष से थक चुके हैं, लेकिन शांति की राह आसान नहीं है।

ईरान और अमेरिका के बीच शर्तों का अंतर अभी भी काफी बड़ा है, जिससे तत्काल समझौते की संभावना कम नजर आती है।

कुछ विशेषज्ञ ट्रंप के बयानों को कूटनीतिक दबाव की रणनीति मान रहे हैं, जबकि अन्य इसे राजनीतिक संदेश के रूप में देख रहे हैं।

निष्कर्ष

फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि आने वाले दिनों में कोई ठोस समझौता हो पाएगा या नहीं।

लेकिन इतना जरूर है कि इस संघर्ष ने पूरी दुनिया को प्रभावित किया है और शांति की उम्मीद अब भी कायम है।

दुनिया की नजरें अब वॉशिंगटन और तेहरान के अगले कदम पर टिकी हुई हैं।

अगर दोनों पक्ष किसी समझौते पर पहुंचते हैं, तो न केवल मिडिल ईस्ट में स्थिरता आएगी, बल्कि वैश्विक ऊर्जा संकट भी काफी हद तक कम हो सकता है।

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