इस्लामिक देशों के संगठन ऑर्गनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन (OIC) ने एक बार फिर जम्मू-कश्मीर मुद्दे पर बयान जारी कर भारत-विरोधी रुख अपनाया है। ओआईसी के महासचिवालय ने 8 जनवरी 2026 को जारी एक विस्तृत बयान में 5 जनवरी 1949 के संयुक्त राष्ट्र आयोग (UNCIP) के प्रस्ताव का हवाला देते हुए जम्मू-कश्मीर के लोगों के स्व-निर्णय के अधिकार को दोहराया है।
ओआईसी ने दावा किया कि यह प्रस्ताव और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के संबंधित प्रस्ताव जम्मू-कश्मीर विवाद के समाधान का कानूनी ढांचा बने हुए हैं।
5 अगस्त 2019 के फैसलों को बताया “अवैध”
ओआईसी ने जम्मू-कश्मीर के लोगों के प्रति अपनी पूर्ण एकजुटता जताई और 5 अगस्त 2019 तथा उसके बाद लिए गए सभी एकतरफा कदमों को अंतरराष्ट्रीय कानून और यूएन प्रस्तावों के खिलाफ बताया। संगठन ने इन फैसलों को वापस लेने और संयुक्त राष्ट्र से इन प्रस्तावों को लागू कराने की मांग की।
संगठन ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील की कि वह जम्मू-कश्मीर विवाद का “अंतिम समाधान” सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी निभाए।
“राइट टू सेल्फ-डिटर्मिनेशन डे” पर बयान
यह बयान 5 जनवरी – राइट टू सेल्फ-डिटर्मिनेशन डे के अवसर पर जारी किया गया, जो 1949 के यूएन प्रस्ताव की वर्षगांठ पर मनाया जाता है।
पाकिस्तान ने भी इस दिन को बड़े पैमाने पर प्रचारित किया। वहां प्रधानमंत्री और उप-प्रधानमंत्री/विदेश मंत्री ने कश्मीरियों के समर्थन में बयान दिए और ओआईसी से अधिक सक्रिय भूमिका निभाने की अपील की।
पाकिस्तान का एजेंडा और ओआईसी का मंच
यह पहली बार नहीं है जब ओआईसी ने कश्मीर पर इस तरह का बयान जारी किया हो।
पिछले कई वर्षों से:
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ओआईसी जम्मू-कश्मीर को “विवादित क्षेत्र” बताता रहा है,
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प्लेबिसाइट और स्व-निर्णय की बात करता रहा है,
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और पाकिस्तान इस मंच का इस्तेमाल कश्मीर मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाने के लिए करता रहा है।
विश्लेषकों के अनुसार, ओआईसी के अधिकांश बयान पाकिस्तानी दबाव और लॉबिंग का नतीजा होते हैं।
भारत का सख्त रुख: “कोई लोकस स्टैंडी नहीं”
भारत ने ओआईसी के इन बयानों को सिरे से खारिज किया है। भारत का स्पष्ट और दोहराया हुआ रुख है कि:
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जम्मू-कश्मीर भारत का अविभाज्य और संप्रभु हिस्सा है।
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इसकी पुष्टि 1947 के विलय पत्र (Instrument of Accession) और भारतीय संविधान से होती है।
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ओआईसी को जम्मू-कश्मीर पर कोई लोकस स्टैंडी (अधिकार क्षेत्र) नहीं है।
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ऐसे बयान पाकिस्तान की प्रोपेगैंडा मशीनरी से प्रेरित होते हैं।
भारत ने अतीत में भी ओआईसी को “अपनी हद में रहने” की सलाह दी है और कहा है कि संगठन को अपने एजेंडा को पाकिस्तानी प्रचार से प्रभावित नहीं होने देना चाहिए।
विदेश मंत्रालय के सूत्रों की प्रतिक्रिया
विदेश मंत्रालय (MEA) के सूत्रों के अनुसार, ओआईसी के हालिया बयान को:
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तथ्यात्मक रूप से गलत,
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भ्रामक,
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और अनुचित
माना गया है।
भारत ने फिर दोहराया कि अनुच्छेद 370 की समाप्ति के बाद जम्मू-कश्मीर में:
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लोकतंत्र मजबूत हुआ है,
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विकास तेज हुआ है,
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और सुरक्षा स्थिति में उल्लेखनीय सुधार आया है।
वैश्विक रुख: द्विपक्षीय मुद्दा, आंतरिक मामला
विश्लेषकों का कहना है कि वैश्विक स्तर पर अब यह मान्यता मजबूत हो रही है कि:
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कश्मीर मुद्दा भारत-पाकिस्तान का द्विपक्षीय मामला है,
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और अधिकांश देश इसे भारत का आंतरिक विषय मानते हैं।
इस वजह से ओआईसी के बयानों का व्यावहारिक असर सीमित रह जाता है।
भारत का स्पष्ट संदेश
भारत ने साफ किया है कि वह:
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किसी भी बाहरी हस्तक्षेप को बर्दाश्त नहीं करेगा,
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जम्मू-कश्मीर में शांति, विकास और समावेशी शासन के अपने प्रयास जारी रखेगा,
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और क्षेत्र में सामान्य स्थिति को और मजबूत करेगा।
सरकारी सूत्रों का कहना है कि ओआईसी का बयान भारत की स्थिति को कमजोर करने के बजाय और मजबूत करता है कि कश्मीर अब कोई अंतरराष्ट्रीय विवाद नहीं, बल्कि भारत का पूर्णत: आंतरिक और संवैधानिक मामला है।









