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शाहपुर कंडी बैराज से पाकिस्तान को झटका: रावी नदी का अतिरिक्त पानी रुकेगा, सूखे का खतरा बढ़ा

BPC News National Desk
3 Min Read

इस साल गर्मियों में पाकिस्तान के सामने पानी का गंभीर संकट खड़ा होने की आशंका है। भारत द्वारा रावी नदी के अतिरिक्त जल प्रवाह को रोकने की तैयारी ने हालात को और चुनौतीपूर्ण बना दिया है।

जम्मू-कश्मीर सरकार के अनुसार शाहपुर कंडी बैराज का निर्माण 31 मार्च 2026 तक पूरा हो जाएगा। इसके बाद रावी का अतिरिक्त पानी पाकिस्तान की ओर नहीं जाएगा।

क्या है शाहपुर कंडी प्रोजेक्ट और इसका महत्व?

यह बैराज रणजीत सागर डैम के डाउनस्ट्रीम में बनाया जा रहा है।

इसके पूरा होने से:

  • करीब 1,150 क्यूसेक पानी जम्मू-कश्मीर के कठुआ और सांबा जिलों में सिंचाई के लिए जाएगा।

  • 32,000 हेक्टेयर से अधिक भूमि को लाभ मिलेगा।

  • पंजाब में भी लगभग 5,000 हेक्टेयर क्षेत्र सिंचित होगा।

भारत अब अपने हिस्से का पूरा पानी उपयोग कर सकेगा, जो पहले पाकिस्तान की ओर बह जाता था।

सिंधु जल समझौता और पानी विवाद का बैकग्राउंड

1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल समझौता हुआ था।

इसके तहत:

  • पूर्वी नदियां (रावी, ब्यास, सतलुज) → भारत के अधिकार में

  • पश्चिमी नदियां (सिंधु, झेलम, चेनाब) → पाकिस्तान के लिए

हालांकि, भारत में भंडारण सुविधाओं की कमी के कारण रावी का काफी पानी वर्षों तक पाकिस्तान जाता रहा।

पाकिस्तान के लिए क्यों बढ़ेगी मुश्किल?

विशेषज्ञों के अनुसार:

  • पाकिस्तान पहले से ही पानी की कमी झेल रहा है

  • उसकी अर्थव्यवस्था कृषि पर निर्भर है

  • गर्मियों में नदी जल स्तर स्वाभाविक रूप से कम होता है

ऐसे में रावी से अतिरिक्त प्रवाह रुकने से पंजाब और सिंध क्षेत्रों में सूखे का खतरा बढ़ सकता है।

भारत का पक्ष: ‘वैध अधिकार’ का उपयोग

भारत ने स्पष्ट किया है कि:

  • यह कदम पूरी तरह अंतरराष्ट्रीय समझौते के दायरे में है

  • पानी का उपयोग राष्ट्रीय हित में किया जाएगा

  • सूखाग्रस्त क्षेत्रों की सिंचाई प्राथमिकता है

यह निर्णय 2025 के पहलगाम आतंकी हमले के बाद बढ़े तनाव की पृष्ठभूमि में भी देखा जा रहा है।

पानी, राजनीति और कूटनीति का नया तनाव

विश्लेषकों का मानना है कि यह मुद्दा सिर्फ जल प्रबंधन नहीं बल्कि:

  • क्षेत्रीय सुरक्षा

  • कृषि अर्थव्यवस्था

  • भारत-पाक संबंध
    से भी गहराई से जुड़ा हुआ है।

आने वाले महीनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि जल संकट और कूटनीतिक तनाव किस दिशा में बढ़ते हैं।

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