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यूपी में एसआईआर को लेकर सपा ने कर दी बड़ी मांग, अखिलेश बोले- कम से कम तीन महीने बढ़ाई जाए अवधि।

BPC News National Desk
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उत्तर प्रदेश में कानून-व्यवस्था और पुलिस जांच प्रक्रिया को लेकर सियासत एक बार फिर गरमा गई है। समाजवादी पार्टी (सपा) ने राज्य सरकार से मांग की है कि एफआईआर दर्ज होने के बाद प्रारंभिक जांच रिपोर्ट यानी एसआईआर (Special Investigation Report) की तय समय-सीमा को कम से कम तीन महीने तक बढ़ाया जाए। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने इसे न्याय प्रक्रिया को अधिक मजबूत और निष्पक्ष बनाने के लिए जरूरी कदम बताया है।


अखिलेश यादव का बयान: जल्दबाजी में प्रभावित होती है न्याय प्रक्रिया

लखनऊ में पत्रकारों से बातचीत करते हुए अखिलेश यादव ने कहा कि वर्तमान में एसआईआर की समय-सीमा बेहद कम है, जिससे कई गंभीर और जटिल मामलों की सही जांच नहीं हो पाती। उन्होंने कहा:

“कई मामलों की जांच एक-दो महीने में पूरी नहीं हो पाती, इससे निर्दोष परेशान होते हैं और असली अपराधी बच निकलते हैं। सरकार को एसआईआर की अवधि कम से कम तीन महीने करनी चाहिए ताकि निष्पक्ष जांच संभव हो सके।”


सपा का तर्क: जांच की गुणवत्ता बेहतर होगी

सपा नेताओं का कहना है कि मौजूदा व्यवस्था में जल्दबाजी से केस दर्ज हो जाते हैं या जांच बीच में अधूरी रह जाती है। इससे पीड़ितों को न्याय मिलने में देरी होती है और पुलिस पर भी अनावश्यक दबाव बनता है। समय-सीमा बढ़ाने से:

  • जांच अधिक गहराई से हो सकेगी

  • निर्दोषों को राहत मिलेगी

  • कोर्ट में मजबूत केस पेश होंगे

  • पुलिस को उचित समय मिलेगा


सरकार की प्रतिक्रिया का इंतजार

भाजपा सरकार की ओर से अभी तक इस मांग पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। हालांकि गृह विभाग के सूत्रों का कहना है कि एसआईआर की अवधि बढ़ाने से कुछ मामलों में दुरुपयोग की आशंका भी हो सकती है, जिसे लेकर सरकार सतर्क है।


राजनीतिक नजरिया: 2027 चुनाव से जुड़ा संकेत?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सपा द्वारा यह मुद्दा उठाना आगामी 2027 विधानसभा चुनावों से भी जुड़ा हो सकता है। कानून-व्यवस्था और पुलिस सुधार का मुद्दा हमेशा से उत्तर प्रदेश की राजनीति का केंद्र रहा है और विपक्ष इसे सरकार के खिलाफ एक बड़ा हथियार मानता है।


निष्कर्ष

एसआईआर की समय-सीमा बढ़ाने की मांग ने एक बार फिर पुलिस जांच प्रक्रिया और न्याय प्रणाली की पारदर्शिता पर बहस छेड़ दी है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार इस मांग पर क्या रुख अपनाती है और क्या इसमें कोई नीतिगत बदलाव किया जाता है या नहीं।

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