2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों को छह साल हो चुके हैं। हालांकि समय बीत गया है, लेकिन जिन परिवारों ने अपनों को खोया, उनके लिए यह जख्म आज भी ताजा हैं। पीड़ित परिवार अब भी न्याय की राह देख रहे हैं और दोषियों को कड़ी सजा देने की मांग कर रहे हैं।
2020 Delhi riots victims आज भी उस भयावह दौर को याद कर कांप जाते हैं। उनके लिए यह सिर्फ एक घटना नहीं, बल्कि जिंदगी भर का दर्द है।
छह साल बाद भी नहीं भरा 2020 दिल्ली दंगों का घाव
फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली हिंसा की आग में जल उठा था।
दर्जनों लोगों की जान चली गई, सैकड़ों घायल हुए और हजारों परिवार उजड़ गए।
हालांकि हालात सामान्य हो चुके हैं, लेकिन पीड़ित परिवारों के दिलों में डर, गुस्सा और टूटन आज भी जिंदा है।
“मैंने अपने हाथों से बेटे का शव उठाया” – हरि सिंह सोलंकी
2020 Delhi riots victims में शामिल हरि सिंह सोलंकी अपने 26 वर्षीय बेटे राहुल सोलंकी को कभी नहीं भूल पाए।
राहुल देहरादून की एक निजी कंपनी में जूनियर इंजीनियर था। दंगों के समय परिवार मुस्तफाबाद इलाके में रह रहा था। एक दिन राहुल सिर्फ दूध लेने घर से बाहर निकला था, लेकिन हिंसक भीड़ ने उसे घेर लिया।
हरि सिंह भावुक होकर कहते हैं,
“मैं उसे बचाने दौड़ा, लेकिन चारों तरफ हिंसा थी। मैंने अपने हाथों से अपने बेटे का शव उठाया है। उस दर्द को शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता।”
उनकी आंखों में आज भी वही दर्द है, जो छह साल पहले था।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर राहत और नाराजगी दोनों
सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिका खारिज कर दी। इस फैसले से हरि सिंह को कुछ राहत जरूर मिली।
हालांकि, कुछ अन्य आरोपियों को जमानत मिलने पर उन्होंने गहरी नाराजगी जताई।
“जमानत मिलने से गवाहों पर दबाव बढ़ सकता है। बाहर आकर ये लोग सबूतों से छेड़छाड़ कर सकते हैं। इससे न्याय कमजोर पड़ता है।”
पीड़ित परिवारों का मानना है कि जब तक सभी दोषियों को सख्त सजा नहीं मिलती, तब तक उन्हें सुकून नहीं मिलेगा।
खजूरी खास के नितिन की दर्दनाक कहानी
दिल्ली दंगों का दर्द सिर्फ एक परिवार तक सीमित नहीं है।
खजूरी खास निवासी राम सुगर्थ के 15 वर्षीय बेटे नितिन सुगर्थ की भी हिंसा में मौत हो गई थी।
नितिन दंगे शुरू होने के दो दिन बाद फास्ट फूड लेने घर से निकला था। उसी दौरान पुलिस और हिंसक भीड़ की झड़प में वह फंस गया।
राम सुगर्थ कहते हैं,
“इस दर्द का कोई मुआवजा नहीं होता। बस यही चाहते हैं कि दोषियों को ऐसी सजा मिले कि कोई और बच्चा न मरे।”
उनकी पत्नी आज भी बेटे की याद में रो पड़ती हैं।
2020 Delhi riots victims आज भी न्याय की राह देख रहे हैं
2020 Delhi riots victims में शामिल दर्जनों परिवार आज भी अदालतों के चक्कर काट रहे हैं।
कई मामलों में सुनवाई जारी है, लेकिन इंसाफ अब भी अधूरा है।
परिणामस्वरूप, पीड़ित परिवारों में निराशा बढ़ रही है। उन्हें डर है कि कहीं समय के साथ उनके केस कमजोर न पड़ जाएं।
पीड़ितों की एक ही मांग – दोषियों को मिले कड़ी सजा
पीड़ित परिवार किसी मुआवजे या सहानुभूति की मांग नहीं कर रहे।
उनकी सिर्फ एक ही मांग है – न्याय।
हरि सिंह सोलंकी कहते हैं,
“दोषियों को ऐसी सजा मिलनी चाहिए कि कोई और पिता यह दर्द न सहे।”
यही आवाज आज उत्तर-पूर्वी दिल्ली के हर उस घर से निकल रही है, जिसने 2020 में अपनों को खोया।
क्यों जरूरी है सख्त सजा?
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ताकि भविष्य में कोई भीड़ कानून हाथ में न ले
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ताकि पीड़ित परिवारों को भरोसा मिले
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ताकि न्याय व्यवस्था मजबूत बने










