भारत में तेजी से बढ़ते एआई डेटा सेंटर, मैन्युफैक्चरिंग उद्योगों और शहरीकरण के कारण आने वाले वर्षों में भारत की ऊर्जा मांग में भारी वृद्धि होने की संभावना है। विशेषज्ञों के अनुसार, अगले दो दशकों में देश की ऊर्जा खपत लगभग दोगुनी हो सकती है। इस बढ़ती मांग को पूरा करना जितना महत्वपूर्ण है, उससे भी बड़ी चुनौती कार्बन उत्सर्जन को नियंत्रित करना होगा।
एमआईटी-डब्ल्यूपीयू में वैश्विक विशेषज्ञों की चर्चा
पुणे स्थित MIT World Peace University में आयोजित 29वें एनुअल इंडस्ट्री-इंस्टीट्यूट इंटरएक्शन प्रोग्राम के दौरान ऊर्जा क्षेत्र के वैश्विक विशेषज्ञों ने इस विषय पर विस्तार से विचार साझा किए। कार्यक्रम में अग्रणी ऊर्जा और तकनीकी कंपनियों के प्रतिनिधि शामिल हुए, जिन्होंने ऊर्जा सुरक्षा और पर्यावरण संतुलन के बीच तालमेल पर जोर दिया।
नेट-जीरो लक्ष्य और उत्सर्जन नियंत्रण की चुनौती
भारत ने वर्ष 2070 तक ‘नेट-जीरो’ उत्सर्जन का लक्ष्य निर्धारित किया है। साथ ही 2005 के स्तर की तुलना में कार्बन उत्सर्जन को 45 प्रतिशत तक कम करने की प्रतिबद्धता जताई है। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल बिजली उत्पादन बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि ऊर्जा दक्षता, कार्बन कैप्चर और डिजिटल मॉनिटरिंग तकनीकों का उपयोग अनिवार्य होगा।
कार्बन कैप्चर और इंजीनियरिंग कौशल का महत्व
ऊर्जा कंपनियों जैसे BP और ExxonMobil के प्रतिनिधियों ने बताया कि कार्बन कैप्चर तकनीक पारंपरिक इंजीनियरिंग कौशल का ही उन्नत रूप है। इसके लिए रिज़र्वॉयर इंजीनियरिंग, जियोसाइंस और भू-यांत्रिक अध्ययन जैसे क्षेत्रों की विशेषज्ञता आवश्यक है।
विशेषज्ञों ने यह भी कहा कि इंजीनियरों को केवल तकनीकी दक्षता ही नहीं, बल्कि डिजिटल साक्षरता और सिस्टम-आधारित सोच भी विकसित करनी होगी।
डेटा सेंटर और ऊर्जा खपत का बढ़ता दबाव
क्लाउड कंप्यूटिंग और एआई के बढ़ते उपयोग के कारण देशभर में बड़े पैमाने पर डेटा सेंटर स्थापित किए जा रहे हैं। इन केंद्रों को 24×7 बिजली और उन्नत कूलिंग सिस्टम की आवश्यकता होती है, जिससे ऊर्जा खपत में तेज वृद्धि हो रही है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह प्रवृत्ति भविष्य की ऊर्जा योजनाओं पर बड़ा प्रभाव डालेगी।
स्वच्छ ऊर्जा और बहु-स्रोत रणनीति आवश्यक
विशेषज्ञों का मत है कि ऊर्जा परिवर्तन केवल एक स्रोत पर निर्भर होकर संभव नहीं होगा। इसके लिए हाइड्रोकार्बन, सौर और पवन ऊर्जा, हाइड्रोजन, भू-तापीय ऊर्जा और कार्बन कैप्चर तकनीकों का संयुक्त उपयोग करना होगा। Chevron के प्रतिनिधियों ने भी वैल्यू चेन में कार्बन साक्षरता बढ़ाने पर जोर दिया।
भविष्य के इंजीनियरों के लिए नई दिशा
कार्यक्रम में छात्रों को सलाह दी गई कि वे पारंपरिक इंजीनियरिंग ज्ञान के साथ-साथ डेटा साइंस, ऑटोमेशन और पर्यावरण प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में भी दक्षता हासिल करें। विशेषज्ञों के अनुसार, भविष्य में ऊर्जा क्षेत्र के परिवर्तन में कुशल इंजीनियरों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होगी।







