राजधानी नई दिल्ली के प्रमुख सरकारी चिकित्सा संस्थानों में शामिल जीबी पंत अस्पताल (गोविंद बल्लभ पंत इंस्टीट्यूट ऑफ पोस्ट ग्रेजुएट मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च) में लिवर ट्रांसप्लांट की सुविधा पिछले करीब नौ वर्षों से बंद पड़ी है। यह सुविधा उन गरीब और मध्यम वर्ग के मरीजों के लिए जीवनदायिनी साबित हो सकती थी, जो निजी अस्पतालों में भारी खर्च वहन करने में सक्षम नहीं हैं।
करोड़ों रुपये खर्च करने, डॉक्टरों को विदेश में प्रशिक्षण देने और आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार होने के बावजूद यह यूनिट अभी तक शुरू नहीं हो पाई है। इससे हजारों मरीजों को गंभीर परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।
शुरुआत हुई थी, लेकिन सुविधा क्यों बंद हुई?
अस्पताल सूत्रों के अनुसार, कई वर्ष पहले यहां लिवर ट्रांसप्लांट प्रोग्राम शुरू किया गया था। इसके लिए विशेष ऑपरेशन थियेटर, आईसीयू और समर्पित वॉर्ड भी बनाए गए थे। डॉक्टरों को उन्नत प्रशिक्षण के लिए इंग्लैंड भेजा गया था, जहां उन्होंने कई महीनों तक विशेषज्ञ ट्रेनिंग प्राप्त की।
बताया जाता है कि वर्ष 2017 तक यहां दो से तीन सफल लिवर ट्रांसप्लांट भी किए गए थे। हालांकि इसके बाद यह सुविधा अचानक बंद हो गई और तब से दोबारा शुरू नहीं हो सकी।
2024 में जगी उम्मीद, लेकिन काम अधूरा
वर्ष 2024 में दिल्ली सरकार ने इस यूनिट को दोबारा चालू करने के लिए लगभग तीन करोड़ रुपये का बजट आवंटित किया था। अधिकारियों ने दावा किया था कि कुछ तकनीकी और इंफ्रास्ट्रक्चर अपग्रेडेशन के बाद सेवा फिर शुरू हो जाएगी।
लेकिन वर्ष 2026 तक भी स्थिति में कोई ठोस बदलाव नहीं हुआ है। अस्पताल की आधिकारिक जानकारी के अनुसार, लिवर ट्रांसप्लांट यूनिट अभी भी “सेटअप प्रक्रिया” में है।
रिपोर्ट्स में सामने आई बड़ी चुनौतियां
हाल की रिपोर्ट्स, जिनमें The Times of India की समीक्षा भी शामिल है, बताती हैं कि अस्पताल के पास इंफ्रास्ट्रक्चर और लाइसेंस होने के बावजूद ट्रांसप्लांट नहीं हो पा रहे हैं।
मुख्य समस्याएं बताई जा रही हैं:
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विशेषज्ञ सर्जनों की कमी
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प्रशासनिक अड़चनें
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तकनीकी संसाधनों का अभाव
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समन्वय की कमी
मरीजों पर पड़ रहा गंभीर असर
लिवर फेलियर या सिरोसिस से पीड़ित मरीजों के लिए यह सुविधा बेहद महत्वपूर्ण है। निजी अस्पतालों में लिवर ट्रांसप्लांट की लागत 25 से 30 लाख रुपये तक पहुंच जाती है, जो अधिकांश मरीजों के लिए असंभव है।
सरकारी अस्पताल में यह सुविधा शुरू होने से हजारों लोगों को सस्ती और समय पर उपचार मिल सकता था, लेकिन लंबे समय से बंद होने के कारण मरीजों को भारी आर्थिक और मानसिक संकट झेलना पड़ रहा है।
उठ रहे बड़े सवाल
इस मामले को लेकर आम जनता और स्वास्थ्य विशेषज्ञ कई सवाल उठा रहे हैं:
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करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद सेवा क्यों शुरू नहीं हुई?
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क्या डॉक्टरों और विशेषज्ञ स्टाफ की कमी है?
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क्या प्रशासनिक स्तर पर देरी हो रही है?
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सरकार कब तक इसे चालू करेगी?
स्वास्थ्य व्यवस्था पर उठते सवाल
यह मामला सिर्फ एक अस्पताल तक सीमित नहीं है, बल्कि सरकारी स्वास्थ्य ढांचे की चुनौतियों को उजागर करता है। योजनाएं बनती हैं, बजट जारी होता है, लेकिन जमीनी स्तर पर उनका लाभ मरीजों तक नहीं पहुंच पाता।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस यूनिट को जल्द चालू किया जाए, तो यह देश में अंग प्रत्यारोपण सेवाओं को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
निष्कर्ष
जीबी पंत अस्पताल में लिवर ट्रांसप्लांट सुविधा का लंबे समय से बंद होना स्वास्थ्य व्यवस्था की गंभीर खामी को दर्शाता है। मरीजों की उम्मीदें अब भी इस बात पर टिकी हैं कि सरकार और अस्पताल प्रशासन जल्द ही इस जीवनरक्षक सेवा को शुरू करेगा।
गरीब और जरूरतमंद मरीजों के लिए ऐसी सुविधाओं का समय पर उपलब्ध होना ही वास्तविक स्वास्थ्य सुधार की पहचान है।







