मध्य पूर्व में जारी संघर्ष का असर अब वैश्विक बाजारों के साथ-साथ घरेलू उद्योगों पर भी साफ नजर आने लगा है। पेट्रोलियम उत्पाद की कीमतों में उछाल ने फर्नीचर उद्योग की लागत को काफी बढ़ा दिया है।
कच्चे माल के महंगा होने के कारण फर्नीचर की कीमतों में 10 से 15 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जिससे कारोबारियों और ग्राहकों दोनों पर असर पड़ा है।
सिर्फ लकड़ी नहीं, कई चीजों पर निर्भर उद्योग
फर्नीचर निर्माण केवल लकड़ी पर आधारित नहीं होता, बल्कि इसमें कई पेट्रोलियम-आधारित उत्पाद शामिल होते हैं, जैसे:
- एडहेसिव (गोंद)
- रेजिन
- पॉलिश
- प्लास्टिक फिटिंग
- लैमिनेट
इन सभी की कीमतों में वृद्धि से उत्पादन लागत में सीधा इजाफा हुआ है।
मैट्रेस और पैकेजिंग भी हुई महंगी
फर्नीचर के साथ इस्तेमाल होने वाले मैट्रेस, कुशन और पैकेजिंग सामग्री की कीमतें भी बढ़ गई हैं। इससे अंतिम उत्पाद की लागत और ज्यादा बढ़ रही है, जिससे बाजार में महंगाई का दबाव साफ दिख रहा है।
छोटे उद्योगों के लिए बढ़ी चुनौती
छोटे और मध्यम स्तर के उद्यमियों के लिए यह स्थिति ज्यादा कठिन हो गई है। महंगे कच्चे माल के कारण वे ज्यादा स्टॉक नहीं कर पा रहे हैं।
उन्हें यह भी डर है कि अगर भविष्य में कीमतें गिरती हैं, तो उन्हें नुकसान उठाना पड़ सकता है।
ग्राहकों की मांग में आई कमी
बढ़ती कीमतों का असर ग्राहकों के व्यवहार पर भी पड़ा है।
- आम खरीदारी में गिरावट
- केवल शादी-ब्याह जैसे अवसरों पर सीमित खरीदारी
इससे बाजार में मंदी जैसे हालात बनते दिख रहे हैं।
आगे क्या?
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर कच्चे तेल की कीमतें जल्द स्थिर नहीं होतीं, तो फर्नीचर उद्योग को और बड़े नुकसान का सामना करना पड़ सकता है।
उद्योग जगत सरकार से राहत और नीतिगत सहयोग की उम्मीद कर रहा है, ताकि इस संकट से उबरने में मदद मिल सके।








