बालेन्दु शाह एक बार फिर अपने सख्त रुख और आक्रामक विदेश नीति को लेकर चर्चा में हैं। प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने भारत समेत पड़ोसी देशों के साथ संबंधों में अलग तेवर दिखाए हैं, जिसके बाद दोनों देशों के रिश्तों को लेकर नई बहस शुरू हो गई है।
इसी बीच विक्रम मिस्री का प्रस्तावित काठमांडू दौरा अचानक टलने की खबर ने राजनीतिक गलियारों में हलचल बढ़ा दी है। कूटनीतिक जानकार इसे नेपाल की नई सरकार और भारत के बीच बढ़ती असहजता का संकेत मान रहे हैं।
लिपुलेख और कालापानी विवाद फिर बना तनाव की वजह
रिपोर्ट्स के मुताबिक, बालेन्दु शाह सरकार के हालिया बयानों और लिपुलेख सीमा विवाद पर अपनाए गए सख्त रुख ने नई दिल्ली की चिंता बढ़ा दी है।
दरअसल, लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा का मुद्दा लंबे समय से भारत और नेपाल के बीच संवेदनशील विषय रहा है। नेपाल इन क्षेत्रों पर दावा करता रहा है, जबकि भारत इन्हें अपने नियंत्रण वाला हिस्सा मानता है।
हाल के दिनों में नेपाल की राजनीति में यह मुद्दा फिर से गर्माया हुआ है। विपक्षी दल भी सरकार पर दबाव बना रहे हैं कि वह भारत के खिलाफ अधिक आक्रामक रुख अपनाए।
विक्रम मिस्री का दौरा टलने से बढ़ी अटकलें
बताया जा रहा है कि विक्रम मिस्री का नेपाल दौरा दोनों देशों के बीच रिश्तों को मजबूत करने और कई अहम मुद्दों पर बातचीत के लिए प्रस्तावित था। लेकिन अंतिम समय में दौरे के टलने से कई सवाल खड़े हो गए हैं।
हालांकि दोनों देशों की ओर से इस मामले में आधिकारिक रूप से ज्यादा जानकारी साझा नहीं की गई है, लेकिन राजनीतिक विश्लेषक इसे नेपाल सरकार के हालिया रवैये से जोड़कर देख रहे हैं।
कौन हैं बालेन शाह?
बालेन्दु शाह की पहचान एक ऐसे नेता के रूप में बनी है जो पारंपरिक राजनीति से अलग शैली में काम करते हैं। वह पहले काठमांडू के मेयर रह चुके हैं और युवाओं के बीच उनकी मजबूत लोकप्रियता रही है।
2026 के आम चुनाव में उनकी पार्टी को बड़ी सफलता मिली, जिसके बाद वह नेपाल के सबसे युवा प्रधानमंत्रियों में शामिल हो गए। प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने कई बार संकेत दिए कि नेपाल अब विदेश नीति में अधिक स्वतंत्र और संतुलित रुख अपनाना चाहता है।
विदेश नीति में ‘आत्मनिर्भर’ छवि बनाने की कोशिश
रिपोर्ट्स के अनुसार, बालेन शाह ने विदेशी प्रतिनिधियों से मुलाकात के लिए कड़े प्रोटोकॉल लागू करने की बात कही और बिना स्पष्ट उद्देश्य के मुलाकातों से दूरी बनाने का संकेत दिया।
नेपाल के भीतर इस रवैये को लेकर बहस छिड़ी हुई है। कुछ लोग इसे देश की संप्रभुता और आत्मसम्मान से जोड़कर देख रहे हैं, जबकि कई विशेषज्ञों का मानना है कि पड़ोसी देशों के साथ रिश्तों में संतुलन और लचीलापन जरूरी होता है।
भारत-नेपाल संबंध क्यों हैं इतने अहम?
भारत और नेपाल के रिश्ते केवल कूटनीति तक सीमित नहीं हैं। दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक, धार्मिक, आर्थिक और सामाजिक संबंध बेहद गहरे हैं।
लाखों नेपाली नागरिक भारत में काम करते हैं, जबकि दोनों देशों के बीच खुली सीमा व्यवस्था दशकों से चली आ रही है। ऐसे में किसी भी तरह की कूटनीतिक तल्खी का असर आम लोगों पर भी पड़ सकता है।
चीन और भारत के बीच संतुलन बनाने की कोशिश?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बालेन्दु शाह सरकार आने वाले समय में भारत और चीन के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर सकती है।
हालांकि शुरुआती कदमों से यह संकेत जरूर मिला है कि नेपाल अपनी विदेश नीति में अधिक आक्रामक और आत्मनिर्भर छवि पेश करना चाहता है। अब सबकी नजर इस बात पर है कि आने वाले महीनों में भारत-नेपाल संबंध किस दिशा में आगे बढ़ते हैं और क्या दोनों देश बातचीत के जरिए मौजूदा तनाव को कम कर पाएंगे।








