भारत की आध्यात्मिक परंपरा में अनेक ऐसे संत हुए हैं जिन्होंने अपने ज्ञान, तप और ईश्वरभक्ति से समाज को नई दिशा दी। उन्हीं महान विभूतियों में एक नाम Swami Sri Yukteswar Giri का है, जिन्हें “ज्ञानावतार” के रूप में भी जाना जाता है।
उनके जीवन, शिक्षाओं और आध्यात्मिक तेज का प्रभाव आज भी दुनिया भर के करोड़ों लोगों के जीवन में महसूस किया जाता है। उनके महान शिष्य Paramahansa Yogananda ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक Autobiography of a Yogi में अपने गुरु के प्रति गहरी श्रद्धा व्यक्त की है।
योगानन्दजी ने लिखा था कि गुरु के चरणों का स्पर्श करते ही शरीर और मन एक मुक्तिदायक दिव्य तेज से भर जाता था।
श्रीरामपुर में हुआ जन्म, बचपन से था आध्यात्म की ओर झुकाव
Swami Sri Yukteswar Giri का जन्म 10 मई 1855 को श्रीरामपुर में एक संपन्न व्यापारी परिवार में हुआ था। उनका बचपन का नाम प्रियनाथ कड़ार था।
बचपन से ही उनका मन सामान्य शिक्षा और सांसारिक गतिविधियों में अधिक नहीं लगता था। उन्हें पारंपरिक शिक्षा प्रणाली सीमित प्रतीत होती थी। हालांकि उन्होंने गृहस्थ जीवन अपनाया, लेकिन पत्नी के निधन के बाद उन्होंने संन्यास ग्रहण कर लिया और “श्रीयुक्तेश्वर” नाम से प्रसिद्ध हुए।
आध्यात्म और विज्ञान का अद्भुत संतुलन
Swami Sri Yukteswar Giri केवल संत ही नहीं बल्कि गहन आध्यात्मिक वैज्ञानिक भी थे।
वे मानते थे कि शरीर और आत्मा दोनों का अध्ययन आवश्यक है। उनका कहना था कि जिन्होंने शरीर विज्ञान का अध्ययन किया है, उन्हें आत्मविज्ञान का भी अनुसंधान करना चाहिए।
उनके अनुसार शरीर की यांत्रिक संरचना के पीछे एक सूक्ष्म आध्यात्मिक व्यवस्था कार्य करती है। यही कारण था कि वे आध्यात्म और विज्ञान को एक-दूसरे का विरोधी नहीं बल्कि पूरक मानते थे।
योगानन्दजी को दिया विश्वगुरु बनने का प्रशिक्षण
Swami Sri Yukteswar Giri की सबसे बड़ी देन उनके महान शिष्य Paramahansa Yogananda को दिया गया गहन आध्यात्मिक प्रशिक्षण माना जाता है।
उन्होंने लगभग दस वर्षों तक योगानन्दजी को साधना, अनुशासन और ईश्वरानुभूति का प्रशिक्षण दिया। आगे चलकर योगानन्दजी ने गुरु की प्रेरणा से योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ इंडिया तथा Self-Realization Fellowship की स्थापना की।
इन संस्थाओं के माध्यम से आज भी दुनिया भर के लोग क्रियायोग और ध्यान की उच्चतम विधियों का अध्ययन कर रहे हैं।
अंतर्ज्ञान और दिव्य चेतना से परिपूर्ण व्यक्तित्व
कहा जाता है कि Swami Sri Yukteswar Giri अपने शिष्यों के मन के विचारों को भी जान लेते थे, लेकिन उन्होंने कभी अपनी दिव्य शक्तियों का प्रदर्शन नहीं किया।
Paramahansa Yogananda ने एक प्रसंग का उल्लेख करते हुए बताया कि एक बार प्रवचन के दौरान गुरु ने उनसे कहा, “तुम यहाँ नहीं हो।”
पहले योगानन्दजी ने इसका विरोध किया, लेकिन बाद में उन्होंने स्वीकार किया कि उनके मन में भविष्य के आश्रमों की कल्पना चल रही थी। बाद में वही कल्पनाएं वास्तविकता में बदल गईं।
व्यावहारिक जीवन दृष्टि के समर्थक थे श्रीयुक्तेश्वरजी
हालांकि वे उच्च आध्यात्मिक अवस्था में थे, फिर भी उनका दृष्टिकोण पूरी तरह व्यावहारिक था।
वे अपने शिष्यों को बीमार होने पर डॉक्टर के पास जाने की सलाह देते थे। उनका मानना था कि चिकित्सा विज्ञान भी ईश्वर द्वारा निर्धारित नियमों के अनुसार कार्य करता है।
हालांकि वे मानसिक शक्ति और आध्यात्मिक ऊर्जा को रोग निवारण का श्रेष्ठ माध्यम मानते थे। वे अक्सर कहा करते थे — “ज्ञान ही सबसे बड़ा परिमार्जक है।”
संसार में रहते हुए ईश्वर से जुड़ने का संदेश
Swami Sri Yukteswar Giri का जीवन इस बात का उदाहरण है कि सच्चा आध्यात्म संसार से दूर भागना नहीं, बल्कि संसार में रहते हुए भी ईश्वर से जुड़कर जीवन जीना है।
वे बाहरी रूप से सामान्य जीवन जीते थे, लेकिन भीतर से निरंतर ईश्वर चेतना में स्थित रहते थे। यही कारण है कि उन्हें “ज्ञान के तेजमण्डल से आलोकित संत” कहा जाता है।
आज भी प्रेरणा का स्रोत हैं उनकी शिक्षाएं
उनके आविर्भाव दिवस पर उन्हें नमन करते हुए यह कहा जा सकता है कि उनका जीवन आज भी मानवता के लिए प्रेरणा का स्रोत है।
उनकी शिक्षाएं आत्मज्ञान, अनुशासन, सत्य, ध्यान और ईश्वरभक्ति की ओर अग्रसर होने का मार्ग दिखाती हैं।








