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हरिद्वार का आध्यात्मिक हृदय है कनखल, दक्षेश्वर महादेव मंदिर और सती कुंड से जुड़ी हैं गहरी पौराणिक मान्यताएं

BPC News National Desk
6 Min Read

Haridwar का नाम आते ही मन में गंगा, घाट, आरती और आस्था की छवि उभरने लगती है। लेकिन हरिद्वार की आध्यात्मिक पहचान को पूर्णता देने वाला एक ऐसा पवित्र क्षेत्र भी है, जिसे सनातन धर्म में विशेष महत्व प्राप्त है। यह स्थान है Kankhal।

धार्मिक, पौराणिक और सांस्कृतिक दृष्टि से कनखल को हिंदू धर्म का अत्यंत पवित्र तीर्थ माना जाता है। यहां स्थित Daksheshwar Mahadev Temple और सती कुंड से जुड़ी मान्यताएं आज भी करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बनी हुई हैं।

दक्षेश्वर महादेव मंदिर से जुड़ी पौराणिक कथा

कनखल का सबसे प्रमुख और प्राचीन मंदिर Daksheshwar Mahadev Temple है।

पौराणिक कथाओं के अनुसार, इसी स्थान पर प्रजापति दक्ष ने एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया था। दक्ष भगवान शिव के ससुर थे, लेकिन वे शिव को पसंद नहीं करते थे। जब उन्होंने यज्ञ का आयोजन किया तो सभी देवी-देवताओं को आमंत्रित किया गया, लेकिन भगवान शिव को नहीं बुलाया गया।

माता सती के आत्मदाह की कथा

माता सती, जो दक्ष की पुत्री और भगवान शिव की पत्नी थीं, बिना निमंत्रण के अपने पिता के यज्ञ में पहुंच गईं। वहां उन्होंने भगवान शिव का अपमान होते देखा।

पति के अपमान और पिता के व्यवहार से दुखी होकर माता सती ने यज्ञ कुंड में कूदकर अपने प्राण त्याग दिए। इस घटना ने पूरे ब्रह्मांड को हिला दिया था।

कहा जाता है कि माता सती के आत्मदाह के बाद भगवान शिव अत्यंत क्रोधित हो उठे। उन्होंने वीरभद्र को उत्पन्न कर दक्ष के यज्ञ का विनाश कराया। बाद में भगवान शिव के क्रोध को शांत करने के लिए देवी-देवताओं ने प्रार्थना की और तब जाकर स्थिति सामान्य हुई।

यही कारण है कि कनखल को शिव और शक्ति की तपोभूमि माना जाता है।

सती कुंड का आध्यात्मिक महत्व

Sati Kund को वही पवित्र स्थान माना जाता है, जहां माता सती ने यज्ञ अग्नि में स्वयं को समर्पित किया था।

आज भी श्रद्धालु यहां पहुंचकर पूजा-अर्चना करते हैं और आध्यात्मिक ऊर्जा का अनुभव करते हैं। सती कुंड केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि त्याग, सम्मान और आस्था का प्रतीक माना जाता है।

पंच तीर्थों में शामिल है कनखल

Kankhal को हरिद्वार के पंच तीर्थों में भी शामिल किया गया है।

धार्मिक मान्यता है कि हरिद्वार यात्रा तब तक पूर्ण नहीं मानी जाती जब तक श्रद्धालु कनखल में दर्शन और पूजा न करें। मान्यता है कि यहां गंगा स्नान और पूजा करने से व्यक्ति के पाप नष्ट होते हैं और मन को शांति प्राप्त होती है।

साधु-संतों और अखाड़ों की भूमि

यह क्षेत्र साधु-संतों और अखाड़ों की भूमि के रूप में भी प्रसिद्ध है। कनखल में कई दशनामी अखाड़े स्थित हैं, जहां वर्षों से संत और संन्यासी तपस्या करते आ रहे हैं।

कुंभ और अर्धकुंभ के दौरान यह क्षेत्र विशेष रूप से धार्मिक गतिविधियों का केंद्र बन जाता है। देशभर से साधु-संत यहां पहुंचकर सनातन परंपराओं का निर्वहन करते हैं।

मोक्ष की भूमि मानी जाती है कनखल

हिंदू धर्म में कनखल को मोक्ष की भूमि भी माना गया है।

ऐसी मान्यता है कि यहां प्रार्थना करने और अस्थि विसर्जन करने से मृत आत्माओं को मोक्ष की प्राप्ति होती है। यही कारण है कि देश के विभिन्न हिस्सों से लोग अपने परिजनों की अस्थियां लेकर यहां आते हैं और धार्मिक विधि-विधान के साथ गंगा में विसर्जित करते हैं।

शैव और शाक्त परंपराओं का प्रमुख केंद्र

Kankhal शैव और शाक्त दोनों परंपराओं का प्रमुख केंद्र माना जाता है।

भगवान शिव और माता सती की कथा इस भूमि को विशेष आध्यात्मिक महत्व प्रदान करती है। यहां आने वाले श्रद्धालु केवल दर्शन ही नहीं करते, बल्कि एक अद्भुत आध्यात्मिक अनुभूति भी महसूस करते हैं।

आनंदमयी आश्रम भी है प्रमुख आकर्षण

दक्षेश्वर महादेव मंदिर के अलावा कनखल में स्थित Anandamayi Ashram भी श्रद्धालुओं के बीच विशेष आकर्षण का केंद्र है।

मां आनंदमयी को 20वीं सदी की महान संतों में गिना जाता है। उनके आश्रम में देश-विदेश से लोग ध्यान, योग और आध्यात्मिक शांति की तलाश में पहुंचते हैं। आश्रम का शांत वातावरण लोगों को मानसिक सुकून प्रदान करता है।

आज भी जीवंत है सनातन संस्कृति की विरासत

आज के आधुनिक दौर में भी Kankhal अपनी प्राचीन धार्मिक पहचान को संजोए हुए है।

यहां की गलियों, मंदिरों, आश्रमों और घाटों में आज भी सनातन संस्कृति की झलक साफ दिखाई देती है। हर वर्ष लाखों श्रद्धालु यहां पहुंचकर भगवान शिव और माता सती के प्रति अपनी आस्था प्रकट करते हैं।

कनखल केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, आस्था और पौराणिक इतिहास की जीवंत धरोहर है। दक्षेश्वर महादेव मंदिर और सती कुंड की यह पावन भूमि आज भी भक्तों को आध्यात्मिक ऊर्जा और श्रद्धा से भर देती है।

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