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विश्व ब्लड कैंसर दिवस पर जागरूकता

BPC News National Desk
5 Min Read

डोनर्स की कमी से जूझ रहे ब्लड कैंसर मरीज, समय पर स्टेम सेल ट्रांसप्लांट न मिलना बना बड़ी चुनौती

भारत में ब्लड कैंसर आज भी एक गंभीर और जानलेवा बीमारी बनी हुई है। हर साल देश में एक लाख से अधिक लोगों में ब्लड कैंसर की पहचान होती है, जबकि करीब 70 हजार मरीज अपनी जान गंवा देते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि समय पर स्टेम सेल ट्रांसप्लांट मिलने से हजारों मरीजों की जान बचाई जा सकती है, लेकिन डोनर्स की भारी कमी और जागरूकता के अभाव के कारण यह सुविधा सभी तक नहीं पहुंच पा रही है।

विश्व ब्लड कैंसर दिवस से पहले विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि भारत में बड़ी संख्या में मरीजों को सही समय पर मैचिंग डोनर नहीं मिल पाता। कई मामलों में डोनर की तलाश में महीनों की देरी हो जाती है, जिससे बीमारी तेजी से बढ़ जाती है और मरीज के बचने की संभावना कम हो जाती है।

विशेषज्ञों के अनुसार, ब्लड कैंसर के इलाज में स्टेम सेल ट्रांसप्लांट कई बार अंतिम और सबसे प्रभावी विकल्प साबित होता है। यह प्रक्रिया मरीज के शरीर में स्वस्थ रक्त कोशिकाओं और प्रतिरक्षा प्रणाली को दोबारा विकसित करने में मदद करती है। लेकिन भारत में करीब 70 प्रतिशत मरीज ऐसे होते हैं जिन्हें परिवार के बाहर से डोनर की जरूरत पड़ती है। इसके बावजूद देश की कुल आबादी में केवल 0.09 प्रतिशत लोगों ने ही स्टेम सेल डोनर के रूप में पंजीकरण कराया है।

मेदांता सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल, नोएडा में हीमेटो ऑन्कोलॉजी एवं बोन मैरो ट्रांसप्लांट की डायरेक्टर डॉ. ईशा कौल का कहना है कि ब्लड कैंसर बहुत तेजी से फैल सकता है और ऐसे में समय पर ट्रांसप्लांट ही मरीज की जिंदगी बचा सकता है। उन्होंने कहा कि भारत में सबसे बड़ी चुनौती सही समय पर उपयुक्त डोनर का न मिलना है। गंभीर मामलों में कुछ महीनों की देरी भी इलाज के परिणामों को प्रभावित कर सकती है।

भारत में यह समस्या इसलिए और गंभीर हो जाती है क्योंकि स्टेम सेल मैचिंग आनुवंशिक समानता पर निर्भर करती है। डोनर रजिस्ट्री में अलग-अलग जातीय और क्षेत्रीय समूहों की भागीदारी कम होने के कारण मरीजों को मैचिंग डोनर ढूंढने में और अधिक कठिनाई होती है।

डीकेएमएस फाउंडेशन इंडिया के एग्जीक्यूटिव चेयरमैन पैट्रिक पॉल ने कहा कि देश में ट्रांसप्लांट की जरूरत वाले मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है, लेकिन डोनर रजिस्ट्री अभी भी बेहद छोटी है। उन्होंने युवाओं, शिक्षण संस्थानों और कॉर्पोरेट कंपनियों से इस मुहिम में आगे आने की अपील की। उनका कहना है कि समय पर डोनर मिलना मरीज के लिए जिंदगी और मौत का सवाल बन जाता है।

विशेषज्ञों ने यह भी बताया कि ब्लड कैंसर के कई मरीज शुरुआती लक्षणों को सामान्य कमजोरी, वायरल संक्रमण या एनीमिया समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। चेन्नई स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ चाइल्ड हेल्थ एंड हॉस्पिटल फॉर चिल्ड्रन की डॉ. अरुणा राजेंद्रन के मुताबिक, बीमारी का देर से पता चलना इलाज में देरी की सबसे बड़ी वजह है। कई मरीज डर या जागरूकता की कमी के कारण समय पर जांच नहीं कराते, जिससे बीमारी गंभीर अवस्था में पहुंच जाती है।

डॉ. नितिन अग्रवाल ने बताया कि स्टेम सेल डोनेशन को लेकर समाज में कई गलतफहमियां फैली हुई हैं। लोग इसे दर्दनाक और जोखिम भरी प्रक्रिया मानते हैं, जबकि अधिकांश मामलों में यह सामान्य रक्तदान जितनी सरल और सुरक्षित होती है। उन्होंने कहा कि 18 से 35 वर्ष के युवा डोनर पूल को मजबूत बनाने में सबसे अहम भूमिका निभा सकते हैं।

डीकेएमएस फाउंडेशन इंडिया ने वर्ष 2019 से अब तक 2.8 लाख से अधिक संभावित डोनर्स का पंजीकरण किया है और 250 से ज्यादा मरीजों को ट्रांसप्लांट के जरिए नई जिंदगी देने में मदद की है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि देश में स्टेम सेल डोनर रजिस्ट्री को तेजी से मजबूत किया जाए और लोगों में जागरूकता बढ़ाई जाए, तो हजारों ब्लड कैंसर मरीजों को समय पर जीवनरक्षक इलाज मिल सकता है। यही विश्व ब्लड कैंसर दिवस का सबसे बड़ा संदेश भी है कि एक छोटा-सा कदम किसी की जिंदगी बचा सकता है।

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