गाजियाबाद, 5 मार्च 2026: करीब तीन दशक बीत जाने के बाद भी 1996 का चर्चित भोजपुर फर्जी एनकाउंटर मामला पूरी तरह सुलझ नहीं पाया है। इस केस की मुख्य आरोपी पूर्व आईपीएस अधिकारी Jyoti Belur अब तक Central Bureau of Investigation (सीबीआई) की गिरफ्त से बाहर हैं।
आरोपी की अनुपस्थिति के कारण सीबीआई विशेष अदालत में सुनवाई आगे बढ़ाने में लगातार बाधा आ रही है, जिससे न्याय प्रक्रिया लंबित होती दिखाई दे रही है।
1996 में हुआ था कथित एनकाउंटर
यह मामला 8 नवंबर 1996 का है, जब Ghaziabad के भोजपुर थाना क्षेत्र के मछरिया गांव की पुलिया पर पुलिस ने कथित मुठभेड़ में चार युवकों—प्रवेश, जसवीर (जसबीर), जलालुद्दीन और अशोक—को मार गिराया था।
पुलिस ने दावा किया था कि ये अपराधी थे और पुलिस के साथ हुई मुठभेड़ में गोलीबारी के दौरान मारे गए। हालांकि, घटना के बाद ग्रामीणों और पीड़ित परिवारों ने इसे फर्जी एनकाउंटर बताते हुए विरोध प्रदर्शन किया। बढ़ते विवाद के बाद मामले की जांच Central Bureau of Investigation को सौंप दी गई।
सीबीआई जांच में एनकाउंटर को बताया गया फर्जी
सीबीआई की जांच में यह सामने आया कि कथित मुठभेड़ पूरी तरह फर्जी थी। जांच एजेंसी के अनुसार चारों युवक मजदूर थे, जिन्हें पुलिस ने हिरासत में लेकर थाने से उठाया, यातनाएं दीं और बाद में दिनदहाड़े फर्जी मुठभेड़ दिखाकर उनकी हत्या कर दी।
जांच के बाद चार्जशीट में तत्कालीन भोजपुर थानाध्यक्ष लाल सिंह, सब-इंस्पेक्टर जोगिंदर सिंह तथा कांस्टेबल सूर्यभान और सुभाष चंद को आरोपी बनाया गया।
साल 2017 में सीबीआई कोर्ट ने इन चारों पुलिसकर्मियों को हत्या, सबूत मिटाने और झूठे साक्ष्य पेश करने के आरोप में दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी।
पूर्व आईपीएस ज्योति बेलूर पर भी लगे आरोप
इस मामले में सबसे बड़ा सवाल पूर्व आईपीएस अधिकारी Jyoti Belur की भूमिका को लेकर बना हुआ है।
1993 बैच की आईपीएस अधिकारी ज्योति बेलूर उस समय मोदीनगर की सर्कल ऑफिसर (एएसपी रैंक) थीं और यह घटना उनके अधिकार क्षेत्र में हुई थी।
सीबीआई की बैलिस्टिक जांच में यह पाया गया कि मृतकों में से एक जसबीर के शरीर से बरामद गोली उनकी सर्विस रिवॉल्वर से चलाई गई थी। इसके आधार पर अदालत ने सीआरपीसी की धारा 319 के तहत उन्हें आरोपी बनाते हुए समन जारी किया, लेकिन वे अदालत में पेश नहीं हुईं।
इस्तीफा देकर ब्रिटेन चली गईं
घटना के बाद Jyoti Belur ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया और ब्रिटेन चली गईं। बाद में वे यूनाइटेड किंगडम की नागरिक बन गईं।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार वे वर्तमान में University College London में पोलिसिंग और क्राइम साइंस से जुड़े विषयों पर लेक्चर देती हैं।
2005 से वे ड्यूटी पर अनुपस्थित थीं, जिसके चलते केंद्र सरकार ने उन्हें ‘डीम्ड रिजाइन’ मान लिया। उनकी ओर से दायर याचिकाएं उच्च न्यायालय और Supreme Court of India में भी खारिज हो चुकी हैं।
प्रत्यर्पण प्रक्रिया भी अधूरी
साल 2017 में सीबीआई अदालत ने उनके प्रत्यर्पण (एक्सट्राडिशन) के लिए मंजूरी दी थी और प्रक्रिया भी शुरू की गई थी।
हालांकि, लगभग तीन दशक बीत जाने के बावजूद वे भारत नहीं लाई जा सकी हैं। अदालत में समय-समय पर सीबीआई से प्रगति रिपोर्ट मांगी जाती रही है, लेकिन गिरफ्तारी या पेशी अब तक संभव नहीं हो पाई है।
न्याय के इंतजार में पीड़ित परिवार
पीड़ित परिवार और मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि इस मामले में निचले स्तर के पुलिसकर्मियों को सजा तो मिल गई, लेकिन मुख्य आरोपी अब भी कानून की पहुंच से बाहर हैं।
यह मामला फर्जी एनकाउंटरों के खिलाफ न्याय की लंबी लड़ाई का प्रतीक बन चुका है।
करीब तीन दशकों के बाद भी इस केस में अंतिम न्याय का इंतजार जारी है, जबकि सीबीआई और अदालतें अभी भी आरोपी को कानून के कटघरे में लाने के प्रयास कर रही हैं।







