नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह ने संसद में उठाया मामला, भारत और चीन को भेजा विरोध पत्र
नई दिल्ली/काठमांडू। भारत और नेपाल के बीच लंबे समय से चले आ रहे लिपुलेख सीमा विवाद ने एक बार फिर राजनीतिक और कूटनीतिक हलकों में चर्चा तेज कर दी है। नेपाल के प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह ने हाल ही में संसद में इस मुद्दे को उठाते हुए कहा कि लिपुलेख सहित सीमा विवाद का मामला ब्रिटेन के समक्ष भी रखा जाएगा। उनके इस बयान के बाद दोनों देशों के बीच चल रही सीमा संबंधी बहस को नया आयाम मिल गया है।
ताजा विवाद उस समय सामने आया जब भारत और चीन ने वर्ष 2026 की कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए पंजीकरण प्रक्रिया शुरू करने की घोषणा की। इस यात्रा के लिए इस्तेमाल होने वाले प्रमुख मार्गों में से एक उत्तराखंड स्थित लिपुलेख दर्रा है। नेपाल ने इस क्षेत्र पर अपना दावा दोहराते हुए भारत और चीन के समक्ष आधिकारिक विरोध दर्ज कराया है।
क्या है लिपुलेख दर्रा?
लिपुलेख दर्रा हिमालय की ऊंची पर्वत श्रृंखलाओं में स्थित एक रणनीतिक और ऐतिहासिक दर्रा है। यह भारत, नेपाल और चीन (तिब्बत) के त्रि-जंक्शन क्षेत्र के निकट स्थित माना जाता है। यह दर्रा सदियों से व्यापार और धार्मिक यात्राओं का महत्वपूर्ण मार्ग रहा है।
भारत के लिए इसका महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि कैलाश मानसरोवर यात्रा का एक प्रमुख रास्ता इसी दर्रे से होकर गुजरता है। इसके अलावा यह क्षेत्र सामरिक दृष्टि से भी अत्यंत संवेदनशील माना जाता है।
कैलाश मानसरोवर यात्रा से फिर उभरा विवाद
भारत और चीन द्वारा कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए तैयारियों की घोषणा के बाद नेपाल ने आपत्ति जताई। नेपाल का कहना है कि लिपुलेख उसके दार्चुला जिले के अंतर्गत आने वाले क्षेत्र का हिस्सा है और इस मार्ग से जुड़ा कोई भी निर्णय उसकी सहमति के बिना नहीं लिया जाना चाहिए।
नेपाल सरकार ने भारत और चीन दोनों को आधिकारिक नोट भेजकर अपना विरोध दर्ज कराया है। काठमांडू का कहना है कि सीमा विवाद का समाधान होने तक विवादित क्षेत्र से संबंधित गतिविधियों पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए।
ब्रिटेन को शामिल करने की बात से बढ़ी चर्चा
प्रधानमंत्री बालेन शाह के बयान ने इस मुद्दे को और अधिक चर्चा में ला दिया है। संसद में अपने संबोधन के दौरान उन्होंने कहा कि लिपुलेख विवाद की जड़ें ब्रिटिश शासनकाल तक जाती हैं, इसलिए इस मामले को ब्रिटेन के समक्ष भी उठाया जाएगा।
नेपाल का तर्क है कि ऐतिहासिक नक्शों और औपनिवेशिक काल में बनाए गए सीमा निर्धारण दस्तावेजों की समीक्षा आवश्यक है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान अंतरराष्ट्रीय सीमाओं से जुड़े विवादों का समाधान आमतौर पर संबंधित देशों के बीच द्विपक्षीय वार्ता के माध्यम से ही किया जाता है।
पुराना है सीमा विवाद
लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा क्षेत्रों को लेकर भारत और नेपाल के बीच कई वर्षों से मतभेद बने हुए हैं। वर्ष 2020 में भी यह विवाद उस समय सुर्खियों में आया था, जब नेपाल ने नया राजनीतिक नक्शा जारी कर इन क्षेत्रों को अपने क्षेत्र का हिस्सा बताया था।
भारत ने उस समय नेपाल के दावों को स्वीकार नहीं किया था और कहा था कि दोनों देशों के बीच सीमा संबंधी मुद्दों का समाधान स्थापित कूटनीतिक तंत्र के माध्यम से किया जाना चाहिए।
दोनों देशों के बीच सीमा विवाद के बावजूद सांस्कृतिक, धार्मिक और आर्थिक संबंध मजबूत बने हुए हैं। लाखों नेपाली नागरिक भारत में रहते और काम करते हैं, जबकि दोनों देशों के बीच खुली सीमा व्यवस्था भी लागू है।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है लिपुलेख?
लिपुलेख दर्रा केवल धार्मिक दृष्टि से ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि इसका सामरिक महत्व भी काफी बड़ा है। चीन सीमा के निकट स्थित होने के कारण यह क्षेत्र सुरक्षा की दृष्टि से संवेदनशील माना जाता है।
इसके अलावा कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए यह सबसे सुविधाजनक मार्गों में से एक है। भारत ने पिछले वर्षों में इस क्षेत्र में सड़क और बुनियादी ढांचे का विकास भी किया है, जिससे यात्रियों और सुरक्षा बलों की आवाजाही आसान हुई है।
बातचीत से समाधान की उम्मीद
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत और नेपाल के ऐतिहासिक संबंध इतने मजबूत हैं कि दोनों देश संवाद और कूटनीतिक बातचीत के जरिए इस विवाद का समाधान खोज सकते हैं। सीमा विवादों के बावजूद दोनों देशों के बीच सहयोग के अनेक क्षेत्र मौजूद हैं और दोनों सरकारें समय-समय पर द्विपक्षीय वार्ता के माध्यम से मतभेदों को सुलझाने का प्रयास करती रही हैं।
फिलहाल नेपाल द्वारा उठाए गए नए कदम और कैलाश मानसरोवर यात्रा को लेकर जताई गई आपत्ति ने लिपुलेख विवाद को एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय चर्चा का विषय बना दिया है। आने वाले समय में दोनों देशों के बीच होने वाली बातचीत पर पूरे क्षेत्र की नजरें टिकी रहेंगी।








