नई दिल्ली/पुणे: वैश्विक ऊर्जा बाजार में बढ़ती अनिश्चितताओं और भू-राजनीतिक तनावों के बीच भारत की ऊर्जा सुरक्षा को लेकर नई बहस तेज हो गई है। इसी संदर्भ में एमआईटी वर्ल्ड पीस यूनिवर्सिटी द्वारा आयोजित वार्षिक भू-तापीय सम्मेलन ‘मैग्मा 2026’ में विशेषज्ञों ने एक स्वर में कहा कि भारत को पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों के साथ-साथ भू-तापीय ऊर्जा और प्राकृतिक हाइड्रोजन जैसे उभरते विकल्पों पर तेजी से काम करना होगा।
16 से अधिक संस्थानों की भागीदारी
पांच दिवसीय इस सम्मेलन में 16 से अधिक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संस्थानों ने भाग लिया, जिनमें भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण, आईआईटी, आईआईएसईआर, सीएसआईआर की प्रयोगशालाएं और कई बहुराष्ट्रीय कंपनियां शामिल रहीं।
कार्यक्रम में भू-तापीय ऊर्जा की खोज, उत्पादन और संभावनाओं पर गहन चर्चा हुई।
‘बेस-लोड एनर्जी’ की जरूरत पर जोर
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की ऊर्जा जरूरतें केवल सौर और पवन ऊर्जा से पूरी नहीं हो सकतीं। इसके लिए ऐसे “बेस-लोड” ऊर्जा स्रोतों की जरूरत है, जो 24 घंटे बिजली उपलब्ध करा सकें।
भू-तापीय ऊर्जा को इस दिशा में एक मजबूत विकल्प बताया गया है, जिसकी भारत में क्षमता 10 गीगावाट से अधिक आंकी जा रही है।
विशेषज्ञों ने क्या कहा?
सम्मेलन का उद्घाटन सेरोस एनर्जी के सीईओ डॉ. आशीष अग्रवाल ने किया। उन्होंने कहा कि देश की ऊर्जा आत्मनिर्भरता के लिए भू-तापीय ऊर्जा का विकास बेहद महत्वपूर्ण है।
वहीं राष्ट्रीय भूभौतिकी अनुसंधान संस्थान के निदेशक डॉ. प्रकाश कुमार ने उन्नत भूभौतिकीय तकनीकों की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए कहा कि नई तकनीकें भूमिगत संसाधनों की सटीक पहचान में मदद कर रही हैं।
शुरुआती चरण में भारत की भू-तापीय ऊर्जा
विशेषज्ञों ने बताया कि भारत में भू-तापीय ऊर्जा अभी शुरुआती चरण में है। इसकी खोज और विकास में लागत और भौगोलिक सीमाएं बड़ी चुनौती हैं।
हालांकि सरकार और निजी क्षेत्र के सहयोग से पायलट प्रोजेक्ट्स और शोध आधारित पहलें शुरू हो चुकी हैं, जो सकारात्मक संकेत देती हैं।
ऊर्जा मिश्रण में अहम भूमिका निभाएगी भू-तापीय ऊर्जा
समापन सत्र में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ पेट्रोलियम एंड एनर्जी के निदेशक डॉ. शालिवाहन ने कहा कि भू-तापीय ऊर्जा भारत के ऊर्जा मिश्रण में पूरक भूमिका निभाएगी।
उन्होंने कहा कि देश को संतुलित ऊर्जा पोर्टफोलियो अपनाना होगा, जिसमें विभिन्न स्रोत मिलकर ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करें।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से मिलेगी नई रफ्तार
सम्मेलन में एआई और डेटा आधारित तकनीकों के उपयोग पर भी जोर दिया गया। विशेषज्ञों का मानना है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग भूमिगत ऊर्जा संसाधनों की खोज को अधिक सटीक और किफायती बना सकते हैं।
प्राकृतिक हाइड्रोजन पर भी बड़ा फोकस
प्राकृतिक हाइड्रोजन को भविष्य का एक महत्वपूर्ण स्वच्छ ऊर्जा स्रोत बताया गया। विशेषज्ञों ने कहा कि यह पारंपरिक हाइड्रोजन उत्पादन की तुलना में कम लागत और कम प्रदूषण वाला विकल्प हो सकता है।
सौर-पवन के साथ पूरक भूमिका
थर्मैक्स लिमिटेड के विशेषज्ञों ने कहा कि सौर और पवन ऊर्जा तेजी से बढ़ रही हैं, लेकिन भू-तापीय ऊर्जा दूरदराज के क्षेत्रों में स्थानीय ऊर्जा उत्पादन का प्रभावी साधन बन सकती है, खासकर जहां डीजल पर निर्भरता अधिक है।
समन्वय पर जोर
सम्मेलन के संयोजक डॉ. राजीब के. सिन्हाराय ने कहा कि ऊर्जा आत्मनिर्भरता के लिए शोध, उद्योग, शिक्षा और नीति निर्माताओं के बीच मजबूत समन्वय जरूरी है।
ऊर्जा रणनीति में विविधता जरूरी
कुल मिलाकर ‘मैग्मा 2026’ सम्मेलन में यह स्पष्ट संदेश सामने आया कि भारत को अपनी ऊर्जा रणनीति में विविधता लानी होगी।
सौर और पवन ऊर्जा के साथ-साथ भू-तापीय ऊर्जा और प्राकृतिक हाइड्रोजन जैसे विकल्प अपनाकर ही देश भविष्य की ऊर्जा चुनौतियों का प्रभावी समाधान निकाल सकता है।







