टिहरी: पुराना टिहरी सिर्फ एक शहर नहीं था, बल्कि इतिहास, संस्कृति, राजशाही, शिक्षा और सामाजिक जीवन का जीवंत केंद्र था। आज यह शहर भागीरथी नदी पर बनी झील के नीचे दफन हो चुका है। जहां कभी बाजारों की रौनक, मंदिरों की घंटियां और राजमहलों की शान हुआ करती थी, वहां अब केवल पानी का अथाह विस्तार दिखाई देता है। पुराना टिहरी आज तस्वीरों, सरकारी दस्तावेजों और बुजुर्गों की यादों में ही जीवित है।

एक छोटे गांव से राजधानी बनने तक का सफर
टिहरी का इतिहास बेहद समृद्ध और रोचक रहा है। 1815 से पहले यह एक छोटी-सी बस्ती थी, जहां धुनार समुदाय के कुछ परिवार रहते थे और उनका मुख्य कार्य लोगों को नदी पार कराना था।
इस स्थान का उल्लेख स्कन्द पुराण के केदार खंड में भी मिलता है, जहां इसे गणेशप्रयाग और धनुषतीर्थ कहा गया है। भिलंगना नदी और घृत गंगा के संगम क्षेत्र में स्थित होने के कारण इसका नाम पहले त्रिहरी, फिर टीरी और अंततः टिहरी पड़ा।

गढ़वाल रियासत की राजधानी के रूप में उभार
टिहरी का वास्तविक विकास 1815 में शुरू हुआ, जब सुदर्शन शाह ने इसे गढ़वाल रियासत की नई राजधानी बनाया। गोरखों से रियासत वापस मिलने के बाद नई राजधानी की तलाश में यह स्थान चुना गया।
30 दिसंबर 1815 को टिहरी को आधिकारिक रूप से राजधानी घोषित किया गया। सीमित संसाधनों के बावजूद यहां शुरुआती निर्माण कार्य शुरू हुआ और धीरे-धीरे यह शहर प्रशासनिक और सांस्कृतिक केंद्र के रूप में विकसित होने लगा।

शिक्षा, संस्कृति और स्थापत्य का केंद्र
समय के साथ टिहरी में शिक्षा और संस्कृति का व्यापक विकास हुआ। अलग-अलग शासकों के शासनकाल में यहां कई महत्वपूर्ण संस्थाएं स्थापित की गईं:
- प्रताप कॉलेज
- संस्कृत विद्यालय
- मदरसा और पुस्तकालय
- खैराती अस्पताल
- सरकारी प्रेस
1897 में यहां एक प्रसिद्ध घंटाघर का निर्माण किया गया, जो रानी विक्टोरिया की हीरक जयंती की स्मृति में बनाया गया था। यह घंटाघर शहर की पहचान बन गया था।

20वीं सदी में विकास का विस्तार
20वीं सदी में टिहरी शिक्षा और प्रशासन का बड़ा केंद्र बन गया। यहां डिग्री कॉलेज, मॉडल स्कूल, राजमाता कॉलेज और संस्कृत महाविद्यालय जैसे संस्थान स्थापित हुए।
सुमन पुस्तकालय, जिसमें लगभग 30 हजार पुस्तकें थीं, शहर की बौद्धिक धरोहर का महत्वपूर्ण हिस्सा था।


टिहरी जनक्रांति और लोकतांत्रिक बदलाव
1948 में टिहरी जनक्रांति के बाद राजशाही का अंत हुआ और रियासत का विलय संयुक्त प्रांत में कर दिया गया। इसके बाद भी शहर का विकास जारी रहा, लेकिन जल्द ही एक ऐसी परियोजना सामने आई जिसने इसकी नियति बदल दी।

टिहरी बांध: विकास या विस्थापन?
1963 में टिहरी बांध परियोजना की घोषणा हुई। शुरुआत में इसे विकास और ऊर्जा उत्पादन का प्रतीक माना गया, लेकिन जल्द ही स्पष्ट हो गया कि इसके कारण पूरा शहर डूब जाएगा।
1978 में टिहरी बांध विरोधी संघर्ष समिति का गठन हुआ और लंबे समय तक आंदोलन चलते रहे, लेकिन परियोजना को रोका नहीं जा सका।
2005: जब पानी में समा गया पूरा शहर
29 जुलाई 2005 को शहर में पानी भरना शुरू हुआ और लोगों को अपने घर छोड़ने पड़े। 29 अक्टूबर 2005 को जलभराव तेज हो गया और देखते ही देखते पूरा पुराना टिहरी झील में समा गया।
हजारों परिवारों का विस्थापन हुआ और उन्हें नई टिहरी समेत अन्य क्षेत्रों में बसाया गया, लेकिन उनकी यादें और भावनाएं वहीं रह गईं।

यादों में जिंदा एक शहर
जिन गलियों में बचपन बीता, जिन मंदिरों में पूजा हुई और जिन स्कूलों में पढ़ाई हुई—सब कुछ पानी में समा गया। आज टिहरी झील के शांत पानी के नीचे दफन इतिहास का दर्द साफ महसूस होता है।
पुराने टिहरी की तस्वीरें, दस्तावेज और लोगों की स्मृतियां ही इस शहर की असली विरासत हैं।

निष्कर्ष: विकास की कीमत पर खोई विरासत
पुराना टिहरी आज विकास की कीमत पर खोई गई विरासत का प्रतीक बन चुका है। यह शहर भले ही भौगोलिक रूप से अस्तित्व में न हो, लेकिन उत्तराखंड और गढ़वाल के इतिहास में उसका स्थान हमेशा अमर रहेगा।
भागीरथी की गहराइयों में दफन टिहरी आज भी लोगों के दिलों में जिंदा है।








