ऑनलाइन गेमिंग और सट्टेबाजी से जुड़े कारोबार को बड़ा झटका देते हुए अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि जीएसटी केवल प्लेटफॉर्म फीस या ग्रॉस गेमिंग रेवेन्यू (GGR) पर नहीं, बल्कि खिलाड़ियों द्वारा दांव पर लगाई गई पूरी शुरुआती रकम पर लगाया जाएगा। अदालत के इस फैसले को ऑनलाइन गेमिंग उद्योग के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि इससे कंपनियों की कर देनदारी में भारी बढ़ोतरी हो सकती है।
मामले की सुनवाई के दौरान कई ऑनलाइन गेमिंग कंपनियों ने दलील दी थी कि जीएसटी केवल उस राशि पर लगाया जाना चाहिए जो प्लेटफॉर्म सेवा शुल्क या कमीशन के रूप में प्राप्त करता है। कंपनियों का कहना था कि खिलाड़ियों द्वारा लगाई गई पूरी रकम कंपनी की आय नहीं होती, इसलिए उस पर टैक्स लगाना उचित नहीं है। लेकिन अदालत ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि जैसे ही कोई खिलाड़ी पैसा दांव पर लगाता है, वह गतिविधि सट्टेबाजी और जुए की श्रेणी में आ जाती है। ऐसे में कानून के अनुसार पूरी रकम कर के दायरे में आएगी।
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि ऑनलाइन गेमिंग प्लेटफॉर्म खिलाड़ियों से जो रकम लेते हैं, वह केवल सेवा शुल्क तक सीमित नहीं मानी जा सकती। यदि किसी खेल में जीत-हार का निर्धारण दांव पर लगी राशि से जुड़ा है, तो पूरी रकम को ही कर योग्य माना जाएगा। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस प्रकार की गतिविधियों में केवल प्लेटफॉर्म फीस को टैक्स के दायरे में रखना कर कानून की मूल भावना के विपरीत होगा।
इस फैसले के बाद ऑनलाइन गेमिंग कंपनियों पर आर्थिक दबाव बढ़ने की संभावना है। विशेषज्ञों का मानना है कि पूरी दांव राशि पर 28 प्रतिशत जीएसटी लागू होने से कई कंपनियों के कारोबार मॉडल पर असर पड़ सकता है। इससे छोटे और मध्यम स्तर के गेमिंग प्लेटफॉर्म के लिए संचालन लागत बढ़ जाएगी। संभावना जताई जा रही है कि कंपनियां इसका बोझ खिलाड़ियों पर डाल सकती हैं, जिससे ऑनलाइन गेम खेलने की लागत बढ़ सकती है।
ऑनलाइन गेमिंग उद्योग पिछले कुछ वर्षों में भारत में तेजी से बढ़ा है। मोबाइल इंटरनेट और डिजिटल भुगतान के विस्तार के साथ करोड़ों लोग विभिन्न गेमिंग ऐप्स से जुड़े हैं। हालांकि इस क्षेत्र में लंबे समय से यह विवाद बना हुआ था कि कौशल आधारित खेलों और सट्टेबाजी के बीच अंतर कैसे तय किया जाए और टैक्स किस आधार पर लगाया जाए।
सरकार पहले ही ऑनलाइन गेमिंग, कैसीनो और घुड़दौड़ जैसी गतिविधियों पर सख्त रुख अपना चुकी है। जीएसटी परिषद ने भी इन गतिविधियों पर 28 प्रतिशत टैक्स लगाने की सिफारिश की थी। इसके बाद कई कंपनियां अदालत पहुंची थीं और केवल ग्रॉस गेमिंग रेवेन्यू पर टैक्स लगाने की मांग कर रही थीं। लेकिन अदालत के ताजा फैसले ने सरकार के रुख को मजबूती प्रदान की है।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला भविष्य में ऑनलाइन गेमिंग सेक्टर के लिए नई दिशा तय कर सकता है। इससे टैक्स चोरी या कम टैक्स भुगतान की संभावनाएं कम होंगी और सरकार के राजस्व में बढ़ोतरी हो सकती है। वहीं उद्योग से जुड़े लोग इसे कठोर फैसला मान रहे हैं। उनका तर्क है कि अत्यधिक टैक्स बोझ से निवेश और नवाचार प्रभावित हो सकते हैं।
फिलहाल अदालत के फैसले के बाद ऑनलाइन गेमिंग कंपनियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने कारोबारी मॉडल को नए कर ढांचे के अनुरूप ढालने की होगी। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि कंपनियां इस फैसले के बाद अपने शुल्क, इनाम राशि और गेमिंग संरचना में किस तरह के बदलाव करती हैं।






