Bpc News Digital

  • अपनी भाषा चुनें

You are Visiters no

818980
हमें फॉलो करें

भाषा चुनें

नेपाल में चीन के BRI के 9 साल: बड़े वादों से अधूरे सपनों तक की कहानी

BPC News National Desk
5 Min Read

दक्षिण एशिया की राजनीति और रणनीतिक संतुलन में नेपाल हमेशा एक महत्वपूर्ण देश रहा है। भारत और चीन जैसे दो बड़े पड़ोसी देशों के बीच स्थित नेपाल की विदेश नीति लंबे समय तक संतुलन बनाने की कोशिश करती रही है। जब वर्ष 2017 में नेपाल ने चीन की महत्वाकांक्षी परियोजना बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) में शामिल होने का फैसला किया, तब इसे पूरे क्षेत्र की राजनीति में एक बड़े बदलाव के रूप में देखा गया। उस समय भारत में भी इसे लेकर गहरी चिंताएं जताई गई थीं, क्योंकि पाकिस्तान के बाद नेपाल का भी चीन की इस परियोजना में शामिल होना रणनीतिक रूप से अहम माना गया।

नेपाल ने 12 मई 2017 को चीन के साथ बीआरआई समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। हालांकि चीन ने नेपाल को इस परियोजना का प्रस्ताव वर्ष 2013 में ही दे दिया था। दरअसल, चीन के राष्ट्रपति Xi Jinping ने 2013 में बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव की शुरुआत की थी, जिसका उद्देश्य एशिया, यूरोप और अफ्रीका के देशों को सड़क, रेल, बंदरगाह और व्यापारिक नेटवर्क से जोड़ना था।

नेपाल को थी आधुनिक रेलवे और निवेश की उम्मीद

नेपाल के लिए यह परियोजना उम्मीदों का बड़ा केंद्र बन गई थी। उस समय नेपाल के राजनीतिक नेतृत्व और प्रशासन को विश्वास था कि चीन के सहयोग से देश में आधुनिक रेलवे नेटवर्क विकसित होगा, बड़े हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट शुरू होंगे, सड़कों का विस्तार होगा और विदेशी निवेश बढ़ेगा। इसके साथ ही नेपाल को यह भी उम्मीद थी कि चीन के साथ सीधी व्यापारिक और परिवहन कनेक्टिविटी बनने से उसकी भारत पर निर्भरता कुछ कम होगी।

भौगोलिक रूप से Nepal पूरी तरह स्थलरुद्ध देश है और दशकों तक उसका अधिकांश व्यापार और ट्रांजिट India के रास्ते ही होता रहा है। ऐसे में बीआरआई को नेपाल ने एक वैकल्पिक आर्थिक अवसर के रूप में देखा। खासकर 2015 में भारत-नेपाल सीमा पर हुए विवाद और आपूर्ति संकट के बाद नेपाल में चीन के साथ संबंध मजबूत करने की चर्चा तेज हुई थी। नेपाल के कई राजनीतिक दलों ने तब बीआरआई को देश के आर्थिक विकास का नया रास्ता बताया था।

9 साल बाद भी ज्यादातर परियोजनाएं कागजों में सीमित

लेकिन बीआरआई में शामिल होने के 9 साल बाद तस्वीर उम्मीदों से काफी अलग नजर आती है। नेपाल में जिन बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं की बात हुई थी, उनमें से अधिकांश अब तक जमीन पर दिखाई नहीं देतीं। कई योजनाएं केवल घोषणाओं, बैठकों, समझौतों और सेमिनारों तक सीमित रह गई हैं। चीन-नेपाल रेलवे परियोजना, जिसे बीआरआई का सबसे बड़ा सपना माना गया था, अब तक कागजों में ही अटकी हुई है।

राजनीतिक अस्थिरता और वित्तीय चुनौतियां बनीं बड़ी वजह

विशेषज्ञों का मानना है कि नेपाल में बीआरआई की धीमी प्रगति के पीछे कई कारण हैं। पहला कारण नेपाल की राजनीतिक अस्थिरता है। पिछले कुछ वर्षों में नेपाल में लगातार सरकारें बदलती रहीं, जिससे दीर्घकालिक परियोजनाओं पर प्रभाव पड़ा। दूसरा बड़ा कारण वित्तीय चुनौतियां हैं। चीन की ओर से मिलने वाले ऋण और निवेश की शर्तों को लेकर नेपाल में कई बार सवाल उठे। Sri Lanka के हंबनटोटा बंदरगाह का उदाहरण सामने आने के बाद नेपाल में भी “डेट ट्रैप” यानी कर्ज के जाल को लेकर चिंता बढ़ी।

हिमालयी भूगोल बना बड़ी बाधा

इसके अलावा हिमालयी भूगोल भी बड़ी चुनौती साबित हुआ। नेपाल में रेलवे और बड़े सड़क नेटवर्क का निर्माण तकनीकी रूप से बेहद कठिन और महंगा है। यही वजह है कि कई परियोजनाओं की लागत लगातार बढ़ती गई और वे आगे नहीं बढ़ सकीं।

भारत-नेपाल संबंधों में फिर दिखा सुधार

भारत की नजर से देखें तो नेपाल का बीआरआई में शामिल होना रणनीतिक रूप से संवेदनशील माना गया था। भारत पहले से ही चीन के बढ़ते प्रभाव को लेकर सतर्क रहा है। हालांकि बीते वर्षों में भारत और नेपाल के संबंधों में फिर सुधार देखने को मिला है और दोनों countries के बीच कनेक्टिविटी, ऊर्जा और व्यापार के कई नए समझौते हुए हैं।

क्या नेपाल के लिए सफल होगा BRI?

आज बीआरआई के 9 साल पूरे होने के बाद नेपाल में यह सवाल उठने लगा है कि क्या चीन की यह महत्वाकांक्षी परियोजना वास्तव में नेपाल के विकास का बड़ा माध्यम बन पाएगी या फिर यह केवल राजनीतिक और कूटनीतिक चर्चाओं तक सीमित रह जाएगी। फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि जिन सपनों और उम्मीदों के साथ नेपाल बीआरआई में शामिल हुआ था, वे अभी तक पूरी तरह साकार नहीं हो पाए हैं।

Share This Article
bpcnews.in is one of the fastest-growing Hindi News Portal with the aim of reaching millions of Indians in India and significantly worldwide Indian Diaspora who are eager to stay in touch with India-based news and stories
Leave a comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *