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आवारा कुत्तों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, अस्पतालों-स्कूलों से हटाने के आदेश पर रोक से इनकार

BPC News National Desk
4 Min Read

सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा पुराना आदेश ने आवारा कुत्तों से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में मंगलवार को बड़ा फैसला सुनाते हुए अपने पुराने आदेश को बरकरार रखा है।

अदालत ने पशु प्रेमियों और विभिन्न संगठनों की ओर से दायर उन सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया, जिनमें अस्पतालों, स्कूलों, कॉलेजों और अन्य सार्वजनिक संस्थानों से आवारा कुत्तों को हटाने के आदेश पर रोक लगाने की मांग की गई थी।

सार्वजनिक सुरक्षा को बताया सर्वोच्च प्राथमिकता

सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि आम लोगों की सुरक्षा सर्वोपरि है।

अदालत ने कहा कि यदि किसी क्षेत्र में आवारा कुत्तों की संख्या खतरनाक स्तर तक पहुंच जाती है या लगातार लोगों पर हमलों की घटनाएं सामने आती हैं, तो नगर निगम और स्थानीय निकाय आवश्यक कदम उठा सकते हैं।

न्यायालय ने यह भी कहा कि लाइलाज रेबीज से संक्रमित या अत्यधिक खतरनाक आवारा कुत्तों के मामले में यूथेनेशिया यानी मानवीय तरीके से जीवन समाप्त करने की अनुमति दी जा सकती है।

अस्पतालों और स्कूलों में सुरक्षा जरूरी

मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने सार्वजनिक सुरक्षा को गंभीर मुद्दा बताते हुए कहा कि अस्पतालों, स्कूलों और कॉलेजों जैसे स्थानों पर लोगों, खासकर बच्चों और मरीजों की सुरक्षा सुनिश्चित करना प्रशासन की जिम्मेदारी है।

न्यायालय ने टिप्पणी की कि यदि किसी क्षेत्र में लगातार कुत्तों के काटने या हिंसक हमलों की घटनाएं हो रही हैं, तो स्थानीय प्रशासन हाथ पर हाथ रखकर नहीं बैठ सकता।

नगर निगमों को दिए गए निर्देश

ने नगर निगमों और स्थानीय निकायों को निर्देश दिया कि वे कानून के दायरे में रहकर कार्रवाई करें और उन क्षेत्रों में विशेष निगरानी रखें, जहां आवारा कुत्तों की संख्या तेजी से बढ़ रही है।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यूथेनेशिया केवल विशेष परिस्थितियों में ही अपनाया जाना चाहिए, जैसे कि रेबीज से संक्रमित या अत्यधिक आक्रामक कुत्तों के मामलों में।

लगातार बढ़ रहे हैं डॉग अटैक के मामले

पिछले कुछ वर्षों में देश के कई हिस्सों से आवारा कुत्तों के हमलों की घटनाएं लगातार सामने आई हैं।

कई मामलों में छोटे बच्चों और बुजुर्गों को गंभीर चोटें आईं, जबकि कुछ घटनाओं में लोगों की मौत तक हो चुकी है। इसी को देखते हुए विभिन्न राज्यों और नगर निकायों ने सुप्रीम कोर्ट से स्पष्ट दिशा-निर्देश की मांग की थी।

पशु प्रेमी संगठनों ने जताई चिंता

दूसरी ओर पशु प्रेमी संगठनों का तर्क था कि आवारा कुत्तों को हटाने या यूथेनेशिया की अनुमति देने से पशु अधिकारों का उल्लंघन हो सकता है।

उनका कहना था कि नसबंदी और टीकाकरण जैसे उपायों को अधिक प्रभावी तरीके से लागू किया जाना चाहिए।

हालांकि अदालत ने कहा कि पशु कल्याण महत्वपूर्ण है, लेकिन मानव जीवन और सार्वजनिक सुरक्षा उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है।

रेबीज को लेकर बढ़ी चिंता

विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला देशभर के नगर निगमों और प्रशासनिक संस्थाओं के लिए महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश साबित हो सकता है।

सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार रेबीज एक बेहद खतरनाक बीमारी है, जो संक्रमित कुत्तों के काटने से फैलती है। यदि समय पर इलाज न मिले तो यह जानलेवा साबित हो सकती है।

भारत में हर साल बड़ी संख्या में लोग कुत्तों के काटने का शिकार होते हैं, जिनमें बच्चों की संख्या अधिक होती है।

संतुलित और मानवीय समाधान पर जोर

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद अब स्थानीय निकायों की जिम्मेदारी और बढ़ गई है।

उन्हें एक ओर सार्वजनिक सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी, वहीं दूसरी ओर पशु क्रूरता रोकने संबंधी नियमों का भी पालन करना होगा।

अदालत ने संकेत दिया है कि संतुलित और मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए ही इस समस्या का स्थायी समाधान निकाला जा सकता है।

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